चंद्रनी अंदर राहु आवे छे अने ते एक एक दिवसे एक एक कळाने रोके छे; वळी चंद्र वादळोथी आच्छादित थाय छे. भगवान आत्मामां तेने रोकवावाळो कोई राहु छे नहि, तथा ते कोईथी आच्छादित थतो नथी. माटे चंद्रमानी उपमा तेने लागु पडती नथी.
वळी, ‘समन्तात् ज्वलतु’ कह्युं छे ते सर्व क्षेत्रे तथा सर्व काळे प्रकाश करवानुं जणावे छे; चंद्रमा आवो नथी.
अहा! त्रण काळ त्रण लोकने जाणे एवो आत्मानो प्रकाश छे; ज्यारे चंद्रनो प्रकाश तो थोडो काळ अने थोडा क्षेत्रमां ज होय छे. आ प्रमाणे चंद्र साथे भगवान आत्मानी उपमा लागु पडती नथी.
आ काव्यमां टीकाकार आचार्यदेवे ‘अमृतचंद्र’ एवुं पोतानुं नाम पण जणाव्युं छे. समास पलटीने अर्थ करतां ‘अमृतचंद्र’ना अने ‘अमृतचंद्रज्योति’ना अनेक अर्थो थाय छे ते यथासंभव जाणवा.
हवे श्रीमान अमृतचंद्र आचार्यदेव बे काव्यो कहीने आ समयसारशास्त्रनी आत्मख्याति नामनी टीका पूर्ण करे छे.
‘अज्ञानदशामां आत्मा स्वरूपने भूलीने रागद्वेषमां वर्ततो हतो, परद्रव्यनी क्रियानो कर्ता थतो हतो,– क्रियाना फळनो भोक्ता थतो हतो,–इत्यादि भावो करतो हतो; परंतु हवे ज्ञानदशामां ते भावो कांइ ज नथी ज एम अनुभवाय छे.’–आवा अर्थनुं काव्य प्रथम कहे छेः–
रागद्वेषपरिग्रहे सति यतो जातं क्रियाकारकैः।
भुञ्जाना च यतोऽनुभूतिरखिलं खिन्ना क्रियायाः फलं
श्लोकार्थः– [यस्मात्] जेनाथी (अर्थात् जे परसंयोगरूप बंधपर्यायजनित अज्ञानथी) [पुरा] प्रथम [स्व–परयोः द्वैतम् अभूत्] पोतानुं अने परनुं द्वैत थयुं (अर्थात् पोताना अने परना भेळसेळपणारूप भाव थयो), [यतः अत्र अन्तरं भूतं] द्वैतपणुं थतां जेनाथी स्वरूपमां अंतर पडयुं (अर्थात् बंधपर्याय ज पोतारूप जणायो, [यतः राग–द्वेष–परिग्रहे सति] स्वरूपमां अंतर पडतां जेनाथी रागद्वेषनुं ग्रहण थयुं, [क्रिया–कारकैः जातं] रागद्वेषनुं ग्रहण थतां जेनाथी क्रियाना कारको उत्पन्न थया (अर्थात् क्रियानो अने कर्ता–कर्म आदि कारकोनो भेद पडयो), [यतः च अनुभूतिः क्रियायाः अखिलं फलं भुञ्जाना खिन्ना] कारको उत्पन्न थतां जेनाथी अनुभूति क्रियाना समस्त फळने भोगवती थकी खिन्न थई (–खेद पामी), [तत् विज्ञान–घन–ओघ–मग्नम्] ते अज्ञान हवे विज्ञानघनना ओघमां मग्न थयुं (अर्थात् ज्ञानरूपे परिणम्युं) [अधुना किल किञ्चित् न किञ्चित्] तेथी हवे ते बधुं खरेखर कांई ज नथी.
भावार्थः– परसंयोगथी ज्ञान ज अज्ञानरूपे परिणम्युं हतुं, अज्ञान कांई जुदी वस्तु नहोती; माटे हवे ज्यां ते ज्ञानरूपे परिणम्युं त्यां ते (अज्ञान) कांई ज न रह्युं, अज्ञानना निमित्ते राग, द्वेष, क्रियानुं कर्तापणुं, क्रियाना फळनुं (–सुखदुःखनुं) भोक्तापणुं इत्यादि भावो थता हता ते पण विलय पाम्या; एक ज्ञान ज रही गयुं. माटे हवे आत्मा स्व–परना त्रणकाळवर्ती भावोने ज्ञाता–द्रष्टा थईने जाण्या–देख्या ज करो. २७७.