२७०ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११
‘अज्ञानदशामां आत्मा स्वरूपने भूलीने रागद्वेषमां वर्ततो हतो, परद्रव्यनी क्रियानो कर्ता थतो हतो, क्रियाना फळनो भोक्ता थतो हतो, -इत्यादि भावो करतो हतो;...’
शुं कह्युं? पोताना शुद्ध चैतन्यस्वरूपने जाणे नहि, अने पुण्य-पापने जाण्या करे ए अज्ञानदशा छे. अहा! आवी अज्ञानदशामां, निज ज्ञाता-द्रष्टा स्वरूपने भूलीने रागद्वेषरूप प्रवर्तवुं ते मिथ्यात्व छे. अहाहा...! शुद्ध चिदानंदघन प्रभु पोते छे एने भूलीने रागद्वेषरूप प्रवर्तवुं ते मिथ्यादशा छे. अनंत काळथी जीव आवी मिथ्यादशा वडे दुःखी छे. ‘अपने को आप भूलके हेरान हो गया’. अहा! पोताने भूलीने जीव चतुर्गति-परिभ्रमण करे छे.
अहा! पोताने भूलीने ते परद्रव्यनी क्रियानो कर्ता थतो हतो. शरीर, मन, वाणी तथा शुभाशुभ राग ए पुद्गलना परिणाम छे, ए कांई पोतानी चीज नथी, छतां एनो हुं कर्ता छुं-एम प्रवर्ततो हतो. रागादि भावोनो ते अज्ञानदशामां कर्ता ने भोक्ता थतो हतो. अहा! एणे अनंत वार मुनिव्रत धारण करीने, रागनी क्रियाओ करी करीने, रागथी भिन्न निज चैतन्यनी द्रष्टिना अभावमां एणे रागनुं फळ जे दुःख तेनुं ज वेदन कर्युं छे. समजाय छे कांई...?
‘परंतु हवे ज्ञानदशामां ते भावो कांई ज नथी एम अनुभवाय छे.’ आवा अर्थनुं काव्य प्रथम कहे छेः-
‘यस्मात्’ जेनाथी (अर्थात् जे परसंयोगरूप बंधपर्यायजनित अज्ञानथी) ‘पुरा’ प्रथम ‘स्व–परयोः द्वैतम् अभूत्’ पोतानुं अने परनुं द्वैत थयुं (अर्थात् पोताना अने परना भेळसेळपणारूप भाव थयो)...
कळश बहु मार्मिक-मर्मभर्यो छे. कर्मना निमित्ते जे रागद्वेषमय पर्याय उत्पन्न थई ते बंधजनित पर्याय छे. भावबंध ए बंधजनित पर्याय छे. ए पोतानी चीज नथी छतां एने पोतानी मानवी ते अज्ञान छे, मिथ्याभाव छे. आ बंधजनित पर्याय कर्मना कारणे उत्पन्न थाय छे एम नहि, ए पोताना कारणे उत्पन्न थाय छे; एने कर्मजनित कहेवी ए व्यवहारनय छे. शास्त्रमां एवां व्यवहारनयनां कथन आवे छे, गोमटसारादिमां घणां आवे छे. एने निमित्तनुं ज्ञान कराववा माटेनुं व्यवहारनयनुं कथन समजवुं जोईए.
अहाहा...! शुद्ध चिदानंदघन प्रभु पोते छे. तेने घात करी जे विकारी पर्याय पोतामां उत्पन्न थाय ते पोताथी पोताना कारणे उत्पन्न थाय छे. अहा! आ विकारी दशाने निज चैतन्यमां भेळववी-एनाथी एकता करवी ते द्वैत छे. अहाहा...! पोताना अबंधस्वभावमां बंधभावने भेळववो ते द्वैत छे. शुं कीधुं? आ महाव्रतादिनो के भक्तिनो विकल्प थाय ते राग छे, विभाव छे, संयोगीभाव छे; तेने शुद्ध चैतन्यस्वभाव साथे एकपणे मानवो ते द्वैत छे, विसंवाद छे. गाथा ३मां आवे छे के-भगवान आत्माने पर-राग साथे संबंध कहेवो ए विसंवाद उभो करनारी कथा छे. द्रव्यस्वभावमां एकत्व पामवुं ते बधे सुंदर छे, पण आत्माने रागथी एकपणानो संबंध मानवो ते क्लेश उत्पन्न करनारुं छे.
अहाहा...! जेना अस्तित्व-होवापणामां एकलो ज्ञानानंदनो स्वभाव भर्यो छे ते निज सत्तानी द्रष्टि विना राग उपर लक्ष जतां अज्ञान उत्पन्न थाय छे. अहा! पोतानी चीज जे एक ज्ञायकभावमय छे एमां रागने भेळववो, रागने पोतानो जाणवो त्यां, कहे छे, द्वैत ऊभुं थाय छे. अहा! हुं तो एक चिन्मात्र वस्तु छुं, ने राग भिन्न छे एम नहि जाणतां, हुं अने राग एक छीए एम जाणतां द्वैत खडुं थाय छे. अरे, अनादिथी एने स्व-परनुं द्वैत ज ऊभुं थयुं छे. छे ने अंदर! ‘स्व–परयोः द्वैतम् अभूत’ अहा! आचार्यनी घणी-गूढ शैली छे. गागरमां सागर भर्यो छे. अहा! केवळीना केडायती दिगंबर संतोनी शी वात! ज्ञानमां राग नथी, ने रागमां ज्ञान नथी. अहा! आ परमार्थ सत्य छे. छतां अनादि निगोदथी मांडीने एने स्वपरनी एकताना अज्ञानथी द्वैत ऊभुं थयुं छे. शुद्ध चैतन्य तो अद्वैत एकलुं छे, एमां रागने-परने भेळवतां द्वैत थयुं छे. भाई! आचार्य तने जाग्रत थवानां गाणां गाय छे के- जाग नाथ! जाग. आ राग साथे भळतां तो द्वैत ऊभुं थयुं छे. अरेरे! एकमां द्वैत थयुं ए तो महादुःख छे. विसंवाद छे.
अहाहा...! ‘यतः अत्र अन्तरं भूत’ द्वैतपणुं थतां जेनाथी स्वरूपमां अंतर पडयुं,... आत्मद्रव्य ज्ञान ने आनंदथी भरेलो साक्षात् भगवान छे, एने पामर राग साथे जोडी देतां स्वरूपनुं अंतर पडी गयुं छे, स्वरूपनी प्राप्तिमां विघ्न