Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 4190 of 4199

 

कळश-२७७ः २७१

थयुं छे. एने ज्ञानमां ‘राग ते हुं’ एम भास्युं ने! आ कारणे एने रागनी-विकल्पनी पक्कड थई गई छे. स्वरूपनी पक्कडने बदले एने रागनी-बंधनी पक्कड थई गई छे. चिदानंदघन चैतन्यमय पोतानी चीज छे ते एने दूर रही गई. रागनी-दुःखनी पक्कडमां ज्ञानानंद प्रभु दूर रही गयो.

अरे भाई! भगवान केवळी तो एम कहे छे के-अमारी सामे जो मा; केमके अमारी सामे जोवाथी तने राग उत्पन्न थशे, दुःख थशे. माटे तुं तारी सामे जो, स्वसन्मुख था अने अंतरमां जो. तेथी तने आनंद प्रगटशे. ल्यो, आ रीत छे. आ सिवाय एणे अनादिथी स्व साथे परने भेळवीने द्वैत ज ऊभुं कर्युं छे; रागने ज ग्रह्यो छे.

हवे कहे छे-‘यतः राग–द्वेष–परिग्रहे सति’ स्वरूपमां अंतर पडतां जेनाथी रागद्वेषनुं ग्रहण थयुं, ‘क्रिया– कारकैः जातं’ रागद्वेषनुं ग्रहण थतां जेनाथी क्रियाना कारको उत्पन्न थया (अर्थात् क्रियानो अने कर्ता-कर्म आदि कारकोनो भेद पडयो),...

अहाहा...! शुं कहे छे? के स्वस्वरूप आनंदकंद प्रभु दूर थई जतां रागद्वेषनुं ग्रहण थयुं, अने रागनुं ग्रहण थतां एने क्रिया नाम रागनी क्रियाना षट्कारको उत्पन्न थया. रागादिनो हुं कर्ता, रागादि मारुं कर्म, रागादिनुं हुं करण, रागादि ज में मने दीधां इत्यादि अज्ञानरूप रागादि क्रियाना षट्कारको पोतामां उत्पन्न थया. अहा! भूल केम थई, अने एनुं परिणाम शुं? ए बतावे छे.

अज्ञानीने भूलनी खबर नथी. ए तो समजे छे के-दर्शनमोहनीयना उदयथी मिथ्यात्व थयुं छे. अरे भगवान! आ तुं शुं लाव्यो? दर्शनमोहनीयनो उदय तो जड छे, अने जे विकारना परिणाम तारी दशामां थाय छे ए तो चिदाभास छे. बन्ने वच्चे अभाव छे त्यां ते कर्म शुं करे? कर्मनो उदय विकृतभावने करे एम त्रणकाळमां छे नहि. विकृतभाव तारामां ताराथी थाय छे, द्रव्यकर्म विकार करे छे एम छे ज नहि. तें द्रव्यकर्म साथे संबंध मान्यो छे, पण वास्तवमां एम छे नहि. परमार्थे भगवान आत्मा अबद्धस्पृष्ट ज छे. भाई! जैनना नामे ज्यां त्यां कर्म रखडावे छे एम तुं कहे छे, पण कर्म तो जड छे बापु! ए तने शुं रखडावे?

वस्तु एम छे के-अनादिथी जीवने द्रव्यनी द्रष्टि छूटी गई छे. अनादिथी तेने इन्द्रिय-आधीन ज्ञान वर्ते छे; एटले रागने जाणतां हुं राग छुं-एम रागनी एने पकड थई गई छे. राग पोतानी चीजमां नहि होवा छतां अज्ञानने कारणे रागनी पकड थई गई छे. अने तेथी तेने रागनी क्रियाना षट्कारको उत्पन्न थया छे. पर्यायनी फेरणी ते क्रिया छे. आवे छे ने के-

करता परिनामी दरव, करम रूप परिनाम;
किरिया परजयकी फिरनि, वस्तु एक त्रय नाम.

अहा! भ्रांतिवश एने रागना षट्कारको पेदा थया छे.

पंचास्तिकाय गाथा ६२मां लीधुं छे के-जे राग वा विकार थाय छे तेनो कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, अधिकरण-ते विकार-राग छे. एक समयनी रागनी क्रियाना षट्कारक ते ते पर्यायमां छे. कर्म आदि परद्रव्यमां नहि, ने द्रव्य-गुणमां पण नहि. द्रव्य-गुण तो त्रिकाळ शुद्ध ज छे; ते अशुद्धने केम करे?

अहा! जेणे रागनुं ग्रहण कर्युं छे तेने आनंदकंद प्रभु आत्मानुं ग्रहण थयुं नहि, अने रागनुं ग्रहण थतां तेने क्रियाना षट्कारको उत्पन्न थया. अर्थात् कर्ता, कर्म, करण इत्यादि कारकोना भेद पडी गया. ते पोतानी चीजथी विखुटो पडी गयो. तेने कारको उत्पन्न थतां रागनो अनुभव थयो अने रागनी अनुभूति ना फळपणे तेणे अनादिथी दुःख ज भोगव्युं. अहा! अनादिथी निगोदथी मांडी जैननो दिगंबर साधु थई नवमी ग्रैवेयक गयो त्यां पण तेणे रागनो ज अनुभव कर्यो. गाथा १०२मां आवी गयुं के जे समये जे भावनो कर्ता थाय छे ते समये तेनो ज ते भोक्ता थाय छे. संयोग मळे ए तो पछीनी वात छे. आ तो जे समये राग करे ते ज समये तेनो ते भोक्ता थाय छे.

हवे कहे छे- ‘यतः च अनुभूतिः क्रियायाः अखिलं फलं भुज्जाना खिन्ना’ कारको उत्पन्न थतां जेनाथी अनुभूति क्रियाना समस्त फळने भोगवती थकी खिन्न थई (-खेद पामी),.....

अहाहा...! जोयुं? हुं राग छुं एम रागमां एकताबुद्धि थवाथी रागनुं फळ भोगवतो खेदखिन्न थई गयो. भले शुभराग होय, तोय ते खेदखिन्न ज थई गयो; तेणे खेदने ज भोगव्यो एम कहे छे.