त्यां अज्ञानसमूहनो नाश थईने ते विज्ञानघनस्वभावमां मली गयुं. मिथ्याज्ञाननो व्यय थईने सम्यग्ज्ञाननुं परिणमन थई गयुं. रागनी क्रिया ने तेनुं फळ हवे रह्युं नहि. सम्यग्द्रष्टि चक्रवर्ती होय, बहार अनेक वैभवमां ऊभो होय तोय अंदर ज्ञानमां ए बधुं (पोतानुं) कांई ज नथी. ज्यां लगी पुरुषार्थ ओछो छे त्यांसुधी अविरति-भाव छे, पण ते अविरति-भाव ज्ञानभावने अडतो ज नथी. ज्ञानीनो तो ज्ञाताद्रष्टा भाव ज छे, ने अनंतकाळ ज्ञाताद्रष्टा- भाव ज रहेशे; केवळज्ञान थतां ज्ञाताद्रष्टा ज रहेशे. समजाणुं कांई...?
‘परसंयोगथी ज्ञान ज अज्ञानरूपे परिणम्युं हतुं. अज्ञान कांई जुदी वस्तु नहोती; माटे हवे ज्यां ते ज्ञानरूपे परिणम्युं त्यां ते (अज्ञान) कांई ज न रह्युं,...’
जुओ, पुण्य-पापना विकल्प ए संयोगी चीज छे. विभाव छे ने! ए पोताना स्वभावनी चीज नथी. आ विभावना संगना भावथी, कहे छे, अनादिकाळथी ज्ञान ज अज्ञानरूपे परिणम्युं हतुं; अज्ञान कोई जुदी वस्तु नहोती. अहाहा...! जेम सुतरनी दोरीमां गांठ पडे छे ए कांइ सुतरथी भिन्न चीज नथी, तेम अज्ञान कांई जुदी चीज नथी, एय ज्ञानस्वरूपी प्रभु आत्मानुं ज अज्ञानमय परिणमन छे. अहा! ज्ञानस्वरूप आत्मा साथे रागना एकत्वथी बंधायेली ते अज्ञानमय परिणमनरूप आत्मानी गांठ छे, आम ते आत्माथी जुदी चीज नथी.
भगवान आत्माए रागनो संग कर्यो तेथी तेना ज्ञाननी आवी अज्ञानमय दशा थई छे. आवे छे ने के-
अग्निए लोह-लोढानो संग कर्यो तो एना पर घणना घा पडे छे; तेम असंग चैतन्यज्योत प्रभु आत्माए रागनो संग कर्यो तो एना ज्ञाननुं अज्ञानमय परिणमन थयुं छे. अज्ञानरूप अवस्था (पर्याय अपेक्षा) आत्माथी कोई भिन्न चीज नथी. अज्ञान कहो के संसार कहो, ए आत्मानी पर्यायथी भिन्न चीज नथी. आ शरीर, स्त्री, कुटुंब-परिवार के कर्म ए जीवनो संसार नथी, संसरण (रागना संगमां रहेवुं) ते संसार छे, अने जीवे ते संसार पोताना अज्ञानरूप अपराधथी ऊभो कर्यो छे. केटलाक कहे छे तेम स्त्री-कुटुंब आदि छोडी दीधां तो संसार छूटी गयो एम नहि, अज्ञानभाव-रागना संगनो भाव-छोडवाथी संसार छूटे छे, अर्थात् ज्ञानभावथी ज संसार छूटे छे. समजाणुं कांई...? अहो! दिगंबर संतोए तो न्याल करी दीधा छे. जेने जेने आ वात अंतरमां बेठी ते न्याल थई गया छे.
अहा! अनादिथी पोताना अज्ञानभावथी जीव चोरासीना अवतारमां रखडे छे, कर्मने कारणे रखडे छे एम नथी. भूल पोते करे, ने नाखे कर्म माथे ते कांई भूल मटाडवानी रीत नथी. वास्तवमां आत्मा पोतानी पर्यायमां स्वतंत्रपणे विकार करे छे, एमां कर्मनी अपेक्षा नथी. जो कर्मना कारणे विकार थाय तो आत्मानुं स्वाधीनपणुं रहे नहि; कर्म टळे तो विकार टळे, पण संसारीने कर्म कयारे न होय? वास्तवमां द्रव्यद्रष्टि विना, अज्ञानथी आत्मा स्वयमेव विकारना षट्कारकरूपे परिणमे छे, एमां कर्मनी कोई अपेक्षा नथी. भाई, पहेलां साचो निर्णय तो कर के भूल पोताथी थई छे, कर्मथी नहि. साची समजण करे तो भूल टाळवानो अवकाश छे. बाकी कर्म विकार करावे तो कर्म छोडे त्यारे छूटकारो थाय, पोताने आधीन तो कांई रह्युं नहि, पण एवी वस्तु नथी.
अहीं कहे छे-ते (अज्ञान) ज्ञानरूपे परिणम्युं त्यां ते कांई न रह्युं. अहाहा...! हुं जाणगस्वभावी विज्ञानघन प्रभु आत्मा छुं एम निज सत्तानो निर्णय थयो त्यां अज्ञान रह्युं नहि. भले पर्यायमां अल्पज्ञता छे, पण सर्वज्ञस्वभावी निज आत्मानुं भान थयुं तो अज्ञान कांई न रह्युं. अज्ञान जेवी चीज ज न रही, ज्ञान-ज्ञान- सम्यग्ज्ञान थयुं. समजाणुं कांई...? मिथ्याज्ञान अने सम्यग्ज्ञान-बन्ने साथे रही शकतां नथी, तेथी अंतर्द्रष्टि थतां सम्यग्ज्ञान थयुं तो अज्ञान कांई न रह्युं. आवी वात छे.
अहाहा...! भगवान आत्मा पोतानी चीजनी ज्यां अंदरमां संभाळ लेवा गयो त्यां एने अज्ञान टळी गयुं, ने सम्यग्ज्ञान प्रगट थई गयुं. ज्ञाननेत्र जे बंध हतां ते खुली गयां, कबाट जे बंध हतां ते खुली गयां.
अहा! जिज्ञासु के जेने आ वात धारणामां छे, पण अंतर्द्रष्टि थई नथी तेने हजु कबाट बंध छे. ज्यां अंतर्द्रष्टि थई के तरत ज अज्ञाननो नाश थई कबाट खुली जाय छे, अने त्यारे हुं शांतरसनो-चैतन्यरसनो- आनंदरसनो पिंड छुं एवो अनुभव थाय छे.