२७४ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११
अहा! स्त्रीनो, पुरुषनो, नपुंसकनो कोई आकार आत्मामां नथी. द्रव्य-भाववेदथी रहित विज्ञानघनस्वरूप प्रभु आत्मा छे. प्रवचनसार गाथा १७२मां अलिंगग्रहणना बोलमां आ वात लीधी छे के आत्मामां द्रव्यवेदनी आकृति नथी, तेम भाववेद-विषयवासना पण आत्मामां नथी. अहाहा...! आवी आत्मद्रष्टि जे करे छे ते स्त्री हो, बाळक हो, के पुरुष हो, ते अंतरमां अनुभव करीने सम्यग्दर्शन प्राप्त करी ले छे. स्वसन्मुखनी द्रष्टि वडे ज सम्यग्दर्शन-ज्ञान थाय छे, ए सिवाय एनो बीजो कोई उपाय नथी. अहीं कहे छे स्व-आश्रये ज्यां सम्यग्ज्ञान थयुं त्यां अज्ञान कांई रह्युं नहि; अज्ञाननो नाश थई गयो.
हवे कहे छे-‘अज्ञानना निमित्ते राग, द्वेष, क्रियानुं कर्तापणुं, क्रियाना फळनुं (-सुखदुःखनुं) भोक्तापणुं इत्यादि भावो थता हता ते पण विलय पाम्या; एक ज्ञान ज रही गयुं.’
अहाहा...! शुद्ध चैतन्यमूर्ति प्रभु पोते छे, तेनो अंतर्मुख द्रष्टिमां स्वीकार कर्यो त्यां सम्यग्ज्ञान प्रगट थयुं तो अज्ञानभावमां जे रागद्वेष थता हता ते विलय पाम्या, ने रागनी क्रियाना षट्कारकोथी ते निवृत्त थयो, ने क्रियानुं फळ जे दुःख तेनाथी पण निवृति थई. बाकी शुं रह्युं? तो कहे छे-एक ज्ञान ज रही गयुं. अहाहा...! पोताना ज्ञानानंदस्वभावनी द्रष्टि थई तो सम्यग्दर्शन-ज्ञाननी निर्मळ परिणति प्रगट थई; राग-द्वेष ने तेनुं फळ विलिन थई गया, ने अनाकुळ आनंदनी वीतरागी परिणति प्रगट थई. आत्मामां कर्ता, कर्म आदि स्वभावोनुं निर्मळ परिणमन शरु थयुं. आने धर्म अने वीतरागमार्गनी शरुआत कहेवामां आवे छे.
अहा! पोताना स्वरूपनी द्रष्टि थतां अज्ञान अने अज्ञानथी उत्पन्न थती रागनी क्रिया अने तेनुं फळ दुःख नाश पामी जाय छे. द्रष्टिमां रागेय नथी ने दुःखेय नथी. पण साधकने पर्यायमां किंचित् अशुद्धता छे, राग छे. ज्ञानी तेने यथास्थित जाणे छे. तेने जे ज्ञान वर्ते छे ते जाणे छे के जे अंशे राग छे तेनुं कर्ता-भोक्तापणुं पण छे. करवा- भोगववायोग्य एम नहि, पण अंशे रागनुं परिणमन छे तो परिणमन अपेक्षा तेनुं कर्ता-भोक्तापणुं छे. आवो वीतरागनो अनेकांतस्वरूप मार्ग छे.
एक बाजु ज्ञानीने रागादि विलीन थई गया कहो, ने वळी कर्ता-भोक्तापणुं कहो-आ तो विरुद्ध छे? विवक्षा समजतां विरुद्ध तो कांई ज नथी. ज्ञानीने रागनुं स्वामित्व नथी तो विलीन थई गयो कह्युं, ने किंचित् परिणमन छे तो कर्ता-भोक्तापणुं कह्युं. स्याद्वादीने आमां कांई विरुद्ध भासतुं नथी. समजाणुं कांई...? स्वभावनी द्रष्टिथी जोतां ज्ञानीने राग विद्यमान नथी, ने ज्ञाननी नजरे जुओ तो, पर्यायने जुओ तो किंचित् राग छे, ने तेनुं वेदन पण छे. आवी ज वस्तु छे, तेमां विरुद्ध कांई ज नथी. स्तवनमां आवे छे ने के-
निज सत्ताए शुद्ध, सौने पेखता हो लाल.
हे नाथ! हे सर्वज्ञदेव! अमारी निज सत्ता-निज स्वभाव शुद्ध छे एम आप देखो छो. पर्यायमां जे पुण्य-पापना विकल्प उठे छे-ते आस्रव तत्त्व छे, आत्मा नथी. निज सत्ताए शुद्ध चिदानंदकंद प्रभु छे तेने आप आत्मा जाणो छो. अहा! आवा शुद्ध चैतन्यस्वरूपनी द्रष्टि थवी ते सम्यग्दर्शन अने धर्म छे, अने ए ज अपूर्व पुरुषार्थ छे. आ सिवाय व्रत, तप, दया, दान, भक्ति, पूजा इत्यादि क्रियाकांड तो अनंत काळमां अनंत वार कीधा, पण ए कांई नथी. एनाथी धर्म मानवो ए तो अज्ञानभाव छे. ज्यारे भगवान आत्मानी द्रष्टि ने आश्रय थाय छे त्यारे अज्ञान टळी, ज्ञान थाय छे, ने एक ज्ञान ज रही जाय छे; रागनी क्रिया ने क्रियाफळनो नाश थई जाय छे. समकिती रागनो हवे कर्ता-भोक्ता थतो नथी, एक ज्ञाता-द्रष्टा रही जाय छे. शरीर होय तेनेय ते जाणे, रागनेय जाणे, ने भव होय तेनेय बस (आ पर छे एम) जाणे ज छे.
‘माटे हवे आत्मा स्वपरना त्रणकाळवर्ती भावोने ज्ञाता-द्रष्टा थईने जाण्या-देख्या ज करो.’ जुओ आ भावना! एक के पूर्ण ज्ञान-दर्शनरूप थई जाण्या-देख्या ज करो. ल्यो, आवी वात!
प्रश्नः– पर्याय विलीन थई ते कयां गई? उत्तरः– द्रव्यमां अंदर चाली गई. पर्यायरूप न रही, योग्यतारूपे अंदर द्रव्यमां भळी गई, विज्ञानघनसमूहमां मग्न थई गई. जेम सरकणी गांठ होय छे ते खेंचवाथी कपडामां समाई जाय छे, तेम रागनी एकताबुद्धि हती ते