Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration). Kalash: 278.

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कळश-२७८ः २७प

गांठ हती, ग्रंथिभेद थतां योग्यतारूपे द्रव्यमां अंदरमां समाई गई. त्रिकाळी पर्यायोनो पिंड ए द्रव्य छे ने? अनादि- अनंत पर्यायोनो पिंड ते गुण छे, ने अनंत गुणनो पिंड ते द्रव्य छे. आवी जैनदर्शननी वात अलौकिक छे. एनुं ज्ञान थतां भवनो अंत आवी जाय छे. समकितीने एकाद भव होय ते एना ज्ञाननुं ज्ञेय छे, बस.

कळश–२७८

‘पूर्वोक्त रीते ज्ञानदशामां परनी क्रिया पोतानी नहि भासती होवाथी, आ समयसारनी व्याख्या करवानी क्रिया पण मारी नथी, शब्दोनी छे’–एवा अर्थनुं, समयसारनी व्याख्या करवाना अभिमानरूप कषायना त्यागने सूचवनारुं काव्य हवे कहे छेः–

(उपजाति)
स्वशक्तिसंसूचितवस्तुतत्त्वै–
र्व्याख्या कृतेयं समयस्य शब्दैः ।
स्वरूपगुप्तस्य न किञ्चिदस्ति
कर्तव्यमेवामृतचन्द्रसूरेः ।। २७८ ।।

श्लोकार्थः– [स्व–शक्ति–संसूचित–वस्तु–तत्त्वैः शब्दैः] पोतानी शक्तिथी जेमणे वस्तुनुं तत्त्व (–यथार्थ स्वरूप) सारी रीते कह्युं छे एवा शब्दोए [इयं समयस्य व्याख्या] आ समयनी व्याख्या (–आत्मवस्तुनुं व्याख्यान अथवा समयप्राभृतशास्त्रनी टीका) [कृता] करी छे; [स्वरूप–गुप्तस्य अमृतचन्द्रसूरेः] स्वरूपगुप्त (– अमूर्तिक ज्ञानमात्र स्वरूपमां गुप्त) अमृतचंद्रसूरिनुं [किञ्चित् एव कर्तव्यम् न अस्ति] (तेमां) कांई ज कर्तव्य नथी.

भावार्थः– शब्दो छे ते तो पुद्गल छे. तेओ पुरुषना निमित्तथी वर्ण–पद–वाक्यरूपे परिणमे छे; तेथी तेमनामां वस्तुना स्वरूपने कहेवानी शक्ति स्वयमेव छे, कारण के शब्दनो अने अर्थनो वाच्यवाचक संबंध छे. आ रीते द्रव्यश्रुतनी रचना शब्दोए करी छे ए वात ज यथार्थ छे. आत्मा तो अमूर्तिक छे, ज्ञानस्वरूप छे. तेथी ते मूर्तिक पुद्गलनी रचना केम करी शके? माटे ज आचार्यदेवे कह्युं छे के ‘आ समयप्राभृतनी टीका शब्दोए करी छे, हुं तो स्वरूपमां लीन छुं, मारुं कर्तव्य तेमां (–टीका करवामां) कांई ज नथी.’ आ कथन आचार्यदेवनी निर्मानता पण बतावे छे. हवे जो निमित्तनैमित्तिक व्यवहारथी कहीए तो एम पण कहेवाय छे ज के अमुक कार्य अमुक पुरुषे कर्युं. आ न्याये आ आत्मख्याति नामनी टीका पण अमृतचंद्राचार्यकृत छे ज. तेथी तेने वांचनारा तथा सांभळनाराओए तेमनो उपकार मानवो पण युक्त छे; कारण के तेने वांचवा तथा सांभळवाथी पारमार्थिक आत्मानुं स्वरूप जणाय छे, तेनुं श्रद्धान तथा आचरण थाय छे, मिथ्या ज्ञान, श्रद्धान तथा आचरण दूर थाय छे अने परंपराए मोक्षनी प्राप्ति थाय छे. मुमुक्षुओए आनो निरंतर अभ्यास करवायोग्य छे. २७८.

* कळश २७८ नो उपोद्घात् *

‘पूर्वोक्त रीते ज्ञानदशामां परनी क्रिया पोतानी नहि भासती होवाथी, आ समयसारनी व्याख्या करवानी क्रिया पण मारी नथी, शब्दोनी छे’-एवा अर्थनुं, समयसारनी व्याख्या करवाना अभिमानरूप कषायना त्यागने सूचवनारुं काव्य हवे कहे छे;-

पूर्वोक्त प्रकारे एटले हुं आत्मा एक ज्ञानानंदस्वरूप छुं एवी द्रष्टि थई होवाथी ज्ञानदशामां शरीरनी, वाणीनी के रागनी क्रिया पोतानी भासती नथी. अहाहा...! पर्याय रागथी विमुख थई स्वभावनी सन्मुख थई, पोतानुं अस्तित्व पूर्णस्वरूप अनुभवमां आव्युं तो ए दशा थतां, कहे छे, ज्ञानीने शरीरनी ने वाणीनी क्रिया, ने व्यवहारनो जे विकल्प उठे छे ते क्रिया मारी छे, हु एनो कर्ता छुं एम भासतुं नथी. जुओ आ धर्म ने धर्मीनी अंतरदशा!