२७६ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११
अहाहा...! ज्ञानानंदस्वभावथी भरपुर पूर्णविज्ञानघन प्रभु आत्मा छे. तेने अनुसरीने अनुभव थयो ते अनुभव केवो छे? अहाहा...!
अहाहा...! सम्यग्द्रष्टि-ज्ञानी हुं पूर्ण परमात्मस्वरूप छुं एम पोताने अनुभवे छे, रागवाळो, ने कर्मवाळो छुं एम अनुभवतो नथी. अरे, हुं एक छुं, शुद्ध छुं-एवो विकल्पेय त्यां नथी. अहा! आवी निर्विकल्प अनुभूति थई छे ते ज्ञानी कहे छे-अहा! शब्दोनी रचना शब्दोथी थई छे, ए क्रिया मारी छे, ने हुं एनो कर्ता छुं एम मने भासतुं नथी. में भाषण दीधुं, ने उपदेश आप्यो, ने आ मारो उपदेश-एम माने ए तो मिथ्याभाव छे, मिथ्या अभिमान छे. भाई, उपदेशनी भाषा कोण करे? शुं आत्मा करे? कदीय ना करे. भगवाननी दिव्यध्वनि नीकळे छे तेना कर्ता भगवान नथी. वाणी पोताथी प्रमाणिक छे, परथी प्रमाणिक कहेवी ए तो व्यवहार छे.
अहीं आचार्य भगवान पोतानी वात कहे छे के-समयसारनी व्याख्या करवानी क्रिया मारी नथी. ल्यो, आवी सरस अलौकिक टीका रची, ने हवे आचार्यदेव कहे छे-आ व्याख्या-टीका में करी छे, माराथी थई छे-एम नथी. हुं तो आत्मा छुं, स्वरूपगुप्त छुं, भाषानी क्रिया मारी छे एम छे ज नहि; शब्दोनी गूंथणी में करी छे एम छे ज नहि. गजबनी वात!
अहीं एक बीजी वातः सुनय एने कहीए जेने बीजा नयनी अपेक्षा होय, अर्थात् सुनय सापेक्ष छे. सापेक्षतानो अर्थ शुं? के पर्याय, भेद ने रागनुं लक्ष छोडवुं, तेनी उपेक्षा करवी. ल्यो, ए एनी सापेक्षता छे. जेमके-स्वभाव सन्मुख थतां निश्चयनय प्रगट थयो, तो निश्चयनयने बीजा नयनी अपेक्षा होवी जोईए के नहि? ल्यो, आवो प्रश्न थाय तो समाधान एम छे के-परनी-रागनी-भेदनी उपेक्षा ते अपेक्षा छे. आ सुनयनी व्याख्या कही.
कुनयमां बीजा अनेरा धर्मनी अपेक्षा नथी. प्रमाणमां निश्चयनयना विषय उपरांत व्यवहारनयने पर्यायने भेळववामां आवे छे; द्रव्य-पर्यायस्वरूपनुं ज्ञान कराववामां आवे छे. हवे निश्चयनयने व्यवहारनयनी अपेक्षा शुं? तो व्यवहारनो विषय जे भेद तेनुं लक्ष छोडवुं, पर्यायनुं लक्ष छोडवुं ते एनी सापेक्षता छे. आवो मारग अलौकिक छे भाई!
प्रश्नः– स्व-आश्रये निश्चयनय तो प्रगटयो, पण साथे बीजो नय न होय तो मिथ्यानय थई जाय. उत्तरः– पण बीजो नय होय एनो अर्थ शुं? ए ज के तेना विषयभूत पर्यायनी ने भेदनी उपेक्षा करवी. ल्यो, आ एनी सापेक्षता छे. एनुं लक्ष छोडी त्रिकाळी एक ज्ञायकमां एकाग्र थवुं तेनुं नाम सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान छे.
अहाहा...! समकितीने ज्ञाननी दशामां परनी क्रिया पोतानी भासती नथी. मतलब के पर्यायमां राग छे, लखती वेळा वाणीना जल्पनो विकल्प छे, अने शब्दो लखाय छे, पण जेनी द्रष्टिमां एक ज्ञायक वस्यो छे तेने ए बधी परनी क्रियाओ पोतानी छे, पोते करी छे एम भासतुं नथी. एने तो ए बधी क्रियाओ प्रति उदासीनता ने उपेक्षा ज छे.
वळी एक बीजी वातः नियमसारनी बीजी गाथामां आवे छे के-शुद्ध रत्नत्रयात्मक मार्ग परम निरपेक्ष होवाथी मोक्षनो उपाय छे. जुओ, निश्चय मोक्षमार्ग परम निरपेक्ष छे, तेमां व्यवहारनुं लक्ष नथी, व्यवहारनी तेने अपेक्षा नथी. आ रीते निश्चयने व्यवहारनी अपेक्षा नथी. भाई, आवो अंतरनो मार्ग अनंत काळमां एणे समजणमां लीधो नथी. बहारमां क्रियाकांड करीने मरी गयो पण अंतरनी चीज एणे लक्षमां लीधी नहि. अरे, जे उपेक्षायोग्य छे तेनी अपेक्षा कीधा करी, ने जेनुं अंतरलक्ष करवानुं छे तेनी एणे उपेक्षा ज कीधे राखी छे!
शुद्ध रत्नत्रयनो मार्ग परम निरपेक्ष छे. जुओ आ संतोनी वाणी! आ तो भगवाननी वाणी भाई! मळवी महा मुश्केल कहे छे-भगवान! तारा स्व-आश्रयमां परनी-रागनी ने भेदनी कोई अपेक्षा नथी. ज्यां व्यवहारनी अपेक्षा कही छे त्यां एनी उपेक्षा ए ज एनी अपेक्षा समजवी. गाथामां आवे छे ने के-