अहा! आवो वीतरागनो मारग! एटले तो गाथामां (गाथा ११मां) व्यवहारनयने अभूतार्थ नाम असत्यार्थ कह्यो छे. एने अभूतार्थ जाणवो एनुं नाम एनी सापेक्षता. समजाणुं कांई...?
रीते कह्युं छे एवा शब्दोए ‘इयम् समयस्य व्याख्या’ आ समयनी व्याख्या (-आत्मवस्तुनुं व्याख्यान अथवा समयप्राभृत शास्त्रनी टीका) ‘कृता’ करी छे; ‘स्वरुप गुप्तस्य अमृतचन्द्रसूरेः’ स्वरूपगुप्त (-अमूर्तिक ज्ञानमात्र स्वरूपमां गुप्त) अमृतचंद्रसूरिनुं ‘किच्चित् एव कर्तव्यं न अस्ति’ (तेमां) कांई ज कर्तव्य नथी.
जुओ, आचार्यदेव कहे छे-वस्तुतत्त्वने यथार्थ कहेनारा आ समयसार शास्त्रनी व्याख्या शब्दोथी रचायेली छे, माराथी नहि. अहा! शब्दोनी गुंथणीनी क्रिया शब्दोए ज करी छे, में करी छे एम नथी. पोतानी शक्तिथी शब्दोए ज वस्तुतत्त्व सारी रीते कह्युं छे. अहाहा...! शब्दोमां स्व-परने कहेवानी पोतानी ज शक्ति छे. जेम स्व-परने जाणवानी आत्मानी सहज ज शक्ति छे, तेम स्व-परने कहेवानी शब्दोनी सहज ज शक्ति छे. कोइ एम कहे के शब्दोनी रचना में करी छे तो एनी ए मूढता छे, पागलनी दशा छे. अरे भगवान! शब्दने तो आत्मा अडयोय नथी, ने शब्द आत्मानेय अडयो नथी. जगतनां अनंत तत्त्वो भिन्न भिन्न ज छे. आम छे त्यां शब्दोनी गूंथणी आत्मा करे ए वात ज कयां रहे छे?
प्रश्नः– ते प्रकारनुं ज्ञान काम करे त्यारे शब्दो नीकळे ने? उत्तरः– शब्दो शब्दोथी नीकळे छे, शब्दो तो जडनो भाव छे, तेमां ज्ञाननुं शुं काम छे? ज्ञान ज्ञाननुं काम करे, ज्ञाननुं शब्दोमां कांई ज काम नथी. आत्मा शब्दोनी क्रिया त्रणकाळमां करतो नथी.
भगवानने केवळज्ञान थतां दिव्य वाणी नीकळी ते त्रणकाळ त्रणलोकने यथार्थ जणावे, ए जणाववानी (कहेवानी) परमाणुमां स्वयंनी शक्ति छे, भगवान निमित्त हो, पण एमां भगवाननुं कांई ज कार्य नथी. शब्दोमां स्वपरना वस्तुस्वरूपने कहेवानी पोतानी ज शक्ति छे, ज्ञानने लईने छे एम नथी. ज्ञानने लईने वाणी खरी एम छे नहि. वाणी तो जड छे, तेमां आत्मानुं ज्ञान पेसतुं नथी. (पेसी शकतुं नथी). अहो! केटली स्पष्ट वात! आ समयसारनी व्याख्या शब्दोए करी छे, में अमृतचंद्रे नहि. अहा! ज्यां वाणीना विकल्पनो कर्ता आत्मा नथी, तो वाणीनो कर्ता केम होय?
त्यारे कोई कहे छे-आचार्यदेवे समयप्राभृतनी व्याख्या तो खरेखर करी छे, पण आमां एमणे पोतानी निरभिमानता बतावी छे, तेथी कहे छे-में कांई कर्युं नथी.
अरे भाई! शब्दो तो जड पुद्गलनी पर्याय छे, पुद्गलथी जुदो आत्मा वाणीने केम रचे? आचार्यदेव कहे छे -हुं तो स्वरूपगुप्त छुं. शब्दो ने शरीरथी भिन्न चैतन्यना आनंदमां मशगुल-लीन छुं, ज्ञानस्वभावमां रह्यो छुं, वाणीनी पर्याय एना परमाणुथी थई छे, मारे एनाथी शुं छे? हुं तो एने अडयोय नथी. समजाय छे कांई...?
ए तो एम कहेवाय के-कुंदकुंदाचार्यदेवे आ शास्त्र रच्युं, ने अमृतचंद्रदेवे टीका रची, परंतु ए तो निमित्त कोण हतुं एनुं एमां ज्ञान कराव्युं छे, बाकी एनी रचना शब्दोए ज करी छे, आचार्यदेवे नहि. आ शब्दोनी गूंथणी में करी नथी एम कह्युं एमां आचार्यदेवे वस्तुस्थिति बतावी छे. कोई द्रव्य कोई अन्य द्रव्यनुं काम करे नहि ए वस्तुनो पोकार छे बापु! अने एम ज जाण्युं छे ते आचार्यनी निरभिमानता छे. खरेखर करे अने में कर्युं नथी एम कहे एमां शुं निर्मानता छे? ए तो छल छे. पण आचार्यदेवे तो स्पष्ट वस्तुस्थिति अने पोतानी आत्मस्थिति आ कळशमां खुल्ली करी छे. अहाहा...! आचार्यदेव कहे छे-
हुं जीव छुं, शब्दो अजीव छेः हुं चैतन्य छुं, शब्दो जड छे; हुं अमूर्तिक-अरूपी छुं, शब्दो मूर्तिक-रूपी छे. हुं तो ज्ञानमात्र स्वभावमां गुप्त छुं, ज्यां छुं त्यां छुं, शब्दोमां गयो ज नथी; पछी वाणीनी रचना केम करुं? आ वाणीनी रचनामां मारुं कांई ज कर्तव्य नथी. जुओ आ वस्तुस्थिति कही. आचार्यदेवे आवी ज वस्तुस्थिति जाणी