२७८ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ ते तेमनी निर्मानता छे. बाकी लोकमां तो एक-बे पुस्तक लखे त्यां तो ‘आ अमे लख्युं छे’ -एम फूलीने फाळको थई जाय; अने वळी बीजाने कहे के अमारी किंमत करवी जोईए. हवे शुं किंमत करे? जडनो कर्ता थयो ए ज किंमत थई गई; ए किंमतमां चार गतिमां रखडशे. समजाणुं कांई...?
‘शब्दो छे ते तो पुद्गल छे. तेओ पुरुषना निमित्तथी वर्ण-पद-वाकयरूपे परिणमे छे; तेथी तेमनामां वस्तुना स्वरूपने कहेवानी शक्ति स्वयमेव छे, कारण के शब्दनो अने अर्थनो वाच्यवाचक संबंध छे.’
जोयुं? ‘पुरुषना निमित्तथी’ -एम कह्युं; पण एनो अर्थ शुं? ए ज के शब्दोनी पद-वाकयरूप रचना शब्दोथी थाय छे, निमित्तथी नहि. एमां ज निमित्त निमित्त रह्युं. निमित्तथी थाय-कराय तो निमित्त कयां रह्युं? ‘निमित्तथी’ एम कहेवाय ए तो निमित्तपरक भाषा छे, बाकी निमित्त उपादानमां कांई ज करतुं नथी.
जुओ, शब्द वाचक छे, ने वस्तु वाच्य छे. आम होतां शब्दोमां वस्तुना स्वरूपने कहेवानी शक्ति स्वयमेव छे. वाचक शब्द वाच्यना कारणे छे, के वाच्य वाचकने लईने छे एम नथी, ने कहेनारो होंशियार छे तो वाचक शब्दो छे एम पण नथी. केवळी भगवानने दिव्यध्वनि नीकळे छे माटे एमां केवळज्ञाननी कांई असर छे एम नथी. भाई, जैन तत्त्वज्ञान बहु सूक्ष्म ने गहन छे. हवे कहे छे-
‘आ रीते द्रव्यश्रुतनी रचना शब्दोए करी छे ए वात ज यथार्थ छे. आत्मा तो अमूर्तिक छे, ज्ञानस्वरूप छे, तेथी ते मूर्तिक पुद्गलनी रचना केम करी शके? माटे ज आचार्यदेवे कह्युं छे के “आ समयप्राभृतनी टीका शब्दोए करी छे, हुं तो स्वरूपमां लीन छुं, मारुं कर्तव्य तेमां (-टीका करवामां) कांई ज नथी.” आ कथन आचार्यदेवनी निर्मानता पण बतावे छे.’
जुओ आ वस्तुस्थिति! अमूर्तिक ज्ञानस्वरूपी प्रभु आत्मा, कहे छे, रूपी जड पुद्गलोने केम करी रचे? न रचे. माटे समयप्राभृतनी टीका शब्दोए रची छे, अमृतचंद्रे नहि-आ सिद्धांत छे, आ वस्तुस्थिति छे. हुं तो स्वरूपगुप्त छुं एम कहीने आचार्यदेवे पोतानी अंतरदशा खुल्ली करी छे. आ कथनथी आचार्यदेवे पोतानी निर्मानता पण प्रगट करी छे. हवे व्यवहार कहे छे-
‘हवे जो निमित्तनैमित्तिक व्यवहारथी कहीए तो एम पण कहेवाय छे ज के अमुक कार्य अमुक पुरुषे कर्युं.’ जुओ, आ तो निमित्त कोण हतुं ए बताववा निमित्तनी मुख्यताथी आम कहेवाय छे. आवो कहेवानो व्यवहार छे, पण कार्य निमित्तथी थयुं छे एम छे नहि. आत्मा-पुरुष जडनुं काम करे एम छे नहि. हवे कहे छे-
‘आ न्याये आ आत्मख्याति नामनी टीका पण अमृतचंद्राचार्यकृत छे ज.’ जुओ आ निमित्तनुं कथन! व्यवहारथी आम कहेवाय, पण खरेखर अमृतचंद्राचार्य टीकाना रचयिता नथी, निमित्त छे बस. शब्दनी रचनाथी शास्त्र बन्युं छे, अमृतचंद्र तो निमित्तमात्र छे. जड परमाणुओ अक्षर-पद-वाकयपणे थया छे, आत्मा एने करी शकतो नथी. व्यवहारे अमृतचंद्रकृत कह्युं एनो एवो अर्थ नथी के जडनी अवस्था जड परमाणुओएय करी ने अमृतचंद्रे पण करी. वास्तवमां जडनी अवस्था जड ज करे, आत्मा नहि-आवी ज वस्तुव्यवस्था छे. छतां आत्माए- पुरुषे कर्युं एवुं कथन करवानो व्यवहार छे. हवे कहे छे-
‘तेथी तेने वांचनारा तथा सांभळनाराओए तेमनो उपकार मानवो पण युक्त छे; कारण के तेने वांचवा तथा सांभळवाथी पारमार्थिक आत्मानुं स्वरूप जणाय छे, तेनुं श्रद्धान तथा आचरण थाय छे, मिथ्या ज्ञान, श्रद्धान तथा आचरण दूर थाय छे अने परंपराए मोक्षनी प्राप्ति थाय छे. मुमुक्षुओए आनो निरंतर अभ्यास करवायोग्य छे.’
जुओ, बहारमां मुमुक्षुओमां आवो व्यवहार होवायोग्य छे. शास्त्रनुं पठन-मनन, अने देव-गुरु-शास्त्र प्रति विनय-भक्तिरूप प्रवर्तन मुमुक्षुओमां अवश्य होवायोग्य छे एम अहीं व्यवहार दर्शाव्यो छे. स्व-आश्रय ते निश्चय छे. स्वरूपनी लगनी लागे तेने बहारमां आवो व्यवहार होय छे.
‘आम श्री समयसारनी (श्रीमद्भगवत्कुंदकुंदाचार्यदेवप्रणीत श्री समयसार परमागमनी) श्रीमद् अमृतचंद्राचार्यदेवविरचित आत्मख्याति नामनी टीका समाप्त थई.