देशकी वचनिकामें लिखि जयचंद्र पढै संक्षेप अर्थ अल्पबुद्धिकूं पावनूं,
द्रव्य–भाव–नोकर्म तजि, आतमतत्त्व लखंत.’ –२.
अहाहा...! भरतक्षेत्रमां निज सार वस्तु शुद्धात्मा-पुण्य-पापरहित शुद्ध चैतन्यभाव-ते देखाडवा माटे आचार्य कुंदकुंददेवे गाथाबद्ध प्राकृतमां आ समयसार शास्त्र रच्युं छे. आचार्य अमृतचंद्रदेवे एनी आत्मख्याति नामनी संस्कृत टीका रची छे. अहाहा...! जेवो चैतन्यदेव प्रभु आत्मा छे तेवो वाणी द्वारा प्रसिद्ध कर्यो छे; तथा तेवी ज भावना भावी छे. तेनो जयचंद्र पंडिते चालती भाषामां बहु टुंको अर्थ लख्यो छे, जेथी अल्पबुद्धि जीवो पण पामी शके छे. ते तमे साचा मनथी भणो अने सांभळो. एक ज्ञाता-द्रष्टा एवो शुद्ध आत्मा-तेने ग्रहो. ते ज्ञानस्वरूपी एक चैतन्यबिंब छे. अहाहा...! जेमां देह, मन, वाणी, विकल्प नथी एवा शुद्ध चिदानंद स्वरूपनो अनुभव करो-एम कहे छे. -१.
अविकारी भगवान समयसारनुं अर्थात् सच्चिदानंद प्रभु आत्मानुं वर्णन सांभळनार द्रव्यकर्म, भावकर्म- पुण्यपापना भाव, अने नोकर्म-शरीरादिथी रहित थई शुद्ध चैतन्यस्वरूप निज आत्मतत्त्वने जाणे छे-अनुभवे छे. - २.
‘आ प्रमाणे आ समयप्राभृत (अथवा समयसार) नामना शास्त्रनी आत्मख्याति नामनी संस्कृत टीकानी देशभाषामय वचनिका लखी छे. तेमां संस्कृत टीकानो अर्थ लख्यो छे अने अति संक्षिप्त भावार्थ लख्यो छे; विस्तार कर्यो नथी. संस्कृत टीकामां न्यायथी सिद्ध थयेला प्रयोगो छे. तेमनो विस्तार करवामां आवे तो अनुमानप्रमाणनां पांच अंगोपूर्वक-(१) प्रतिज्ञा’ -एटले शुं कहेवा मागीए छीए एनी प्रतिज्ञा करवी (२) ‘हेतु’ -हेतु बताववो (३) ‘उदाहरण’ -दाखलो आपवो (४) ‘उपनय’ -संज्ञारूपने मेळववुं अथवा निर्णय करवो (प) ‘अने निगमनपूर्वक’ -सरवाळो करवो-एमा पांच बोल छे. आ पांच अंगोनुं ‘स्पष्टताथी’ -विशेष विस्तारथी ‘व्याख्यान लखतां ग्रंथ बहु वधी जाय; तेथी आयु, बुद्धि, बळ अने स्थिरतानी अल्पताने लीधे’ तेथी ओछुं आयुष्य, ओछी बुद्धि, बळ थोडुं अने अल्प स्थिरताने लीधे ‘जेटलुं बनी शकयुं तेटलुं, संक्षेपथी प्रयोजनमात्र लख्युं छे. ते वांचीने भव्य जीवो पदार्थने समजजो. कोई अर्थमां हीनाधिकता होय तो बुद्धिमानो मूळ ग्रंथमांथी जेम होय तेम यथार्थ समजी लेजो. आ ग्रंथना गुरुसंप्रदायनो (गुरुपरंपरागत उपदेशनो) व्युच्छेद थई गयो छे,’ अर्थात् अध्यात्म स्वरूप-अलौकिक चीज-एनी परंपरा तूटी गई छे. ‘माटे जेटलो बनी शके तेटलो अभ्यास थई शके छे. तोपण जेओ स्याद्वादमय जिनमतनी आज्ञा माने छे, तेमने विपरीत श्रद्धान थतुं नथी. कयांक अर्थनुं अन्यथा समजवुं पण थई जाय तो विशेष बुद्धिमाननुं निमित्त मळ्ये यथार्थ थई जाय छे. जिनमतनी श्रद्धावाळाओ हठग्राही होता नथी.’
हवे अंतमंगळने अर्थे पंच परमेष्ठीने नमस्कार करी शास्त्र समाप्त करीए छीए;-
मंगल सिद्ध महंत कर्म आठों परजारे;
आचारज उवज्झाय मुनी मंगलमय सारे,
दीक्षा शिक्षा देय भव्यजीवनिकूं तारे;
अठवीस मूलगुण धार जे सर्वसाधु अणगार हैं,