२८०ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११
अहाहा...! चार घातिकर्मनो नाश करी जेओए परमात्मपद प्राप्त कर्युं छे ते भगवान अनंतचतुष्टयधारी अरिहंत छे. अहाहा...! आत्मानी हीणी दशामां निमित्त जे कर्म तेने जेणे दूर कर्यां छे, अर्थात् जे शरीर रहित थईने एकला पूर्ण आनंदमूर्ति-ज्ञानमूर्ति आत्मापणे थया छे, ने जेणे सर्व पराश्रयनो नाश कर्यो छे ते भगवान सिद्ध छे. वीतरागी संत, आत्माना आनंदना साधक एवा आचार्य, उपाध्याय अने मुनि-आ त्रणेय मंगलमय छे. आचार्य दीक्षा-शिक्षा दई भव्य जीवोने तारे छे. अठ्ठावीस मुलगुणने धरनार एवा सर्व साधु अणगार छे. मंगळना हेतुना करनार होवाथी हुं ए पंचगुरुना चरणकमळमां नमस्कार करुं छुं. पापनो नाश अने पवित्रतानी प्राप्तिमां जे निमित्त छे एवा पंच परमेष्ठीने अहीं मंगळ कह्या छे.
हवे पं. जयचंद्रजी पोतानी वात कहे छेः-
जयपुर नगरमां जैनोनी मोटी वस्ती छे, मंदिरो छे. मोटा मोटा गुणीजनो ग्रंथना सारनो अभ्यास करे छे. एमां जयचंद्र नामे हुं एक थयो. मने कांईक थोडो अभ्यास छे. मारी बुद्धि प्रमाणे धर्मानुरागथी में आ समयसार ग्रंथनो देशी-चालती भाषामां अर्थ कर्यो छे. तेने जाणो, सांभळो, ने निर्णय करो. सांभळ्युं कयारे कहेवाय? के कह्या प्रमाणे समजी अंतरमां स्वसंवेदन करे; अंदर आनंदनी अनुभूति प्रगट करे त्यारे सांभळ्युं कहेवाय. माटे स्वपरनो भेद जाणी हेयने त्यागीने शुद्ध आत्माने ग्रहण करो. ल्यो, आटलो ज सार छे. आ विना बधुं थोथां छे एम कहे छे.
चौसठि कातिक वदि दशै, पूरण ग्रंथ सुठौर. –३.
संवत अढारसो चोसठ, कारतक वदी दसमने दिने आ ग्रंथनी वचनिका पूर्ण थई. आम श्रीमद्भगवत्कुंदकुंदाचार्यदेवप्रणीत समयप्राभृत नामना प्राकृतगाथाबद्ध परमागमनी श्रीमद् अमृतचंद्राचार्यदेवविरचित आत्मख्याति नामनी संस्कृत टीका अनुसार पंडित जयचंद्रजीकृत संक्षेपभावार्थमात्र देशभाषामय वचनिका उपरनां परमोपकारी आत्मज्ञ संत श्री कानजीस्वामीनां सारगर्भित मनोज्ञ प्रवचनो समाप्त थयां.