१७४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३
भावो छे ते बधाय [एकस्य पुद्गलस्य हि निर्माणम्] एक पुद्गलनी रचना [विदन्तु] जाणो; [ततः] माटे [इदं] आ भावो [पुद्गलः एव अस्तु] पुद्गल ज हो, [न आत्मा] आत्मा न हो; [यतः] कारण के [सः विज्ञानघनः] आत्मा तो विज्ञानघन छे, ज्ञाननो पुंज छे, [ततः] तेथी [अन्यः] आ वर्णादिक भावोथी अन्य ज छे. ३९.
आ रीते ए सिद्ध थयुं के वर्णादिक भावो जीव नथी-एम हवे कहे छेः-
झीणी वात छे, प्रभु! धर्म समजवो ए सूक्ष्म वात छे, भाई! अनंतकाळमां ए (अज्ञानी) अनेकवार त्यागी थयो, हजारो राणीओ छोडी नग्न दिगंबर साधु थईने जंगलमां रह्यो, परंतु चैतन्यस्वरूप पोतानो आत्मा रागनी क्रियाथी रहित छे एवुं एणे कदीय भान कर्युं नथी. रागनी क्रिया करतां करतां आत्मा हाथ आवशे एम माननारे जडनी क्रिया करतां करतां चैतन्य प्राप्त थशे एम मान्युं छे. आवुं माननारने अहीं कहे छे के-निश्चयनये कर्म अने करणनुं अभिन्नपणुं छे. शुं कह्युं? के सत्यार्थद्रष्टिए कर्म एटले कार्य अने करण एटले एनुं कारण- साधन ए बे एकमेक छे, अभिन्न छे. माटे जे जेना वडे कराय छे ते, ते ज छे. कर्म अने करण बे जुदां (द्रव्यो) न होय. एटले के साधन अने कार्य अर्थात् कारण अने कार्य बे भिन्न नथी, एकमेक ज छे. जे जेना वडे कराय छे ते, ते ज छे. हवे द्रष्टांत आपे छेः-
सुवर्णनुं पानुं सुवर्ण वडे कराय छे माटे ते सुवर्ण ज छे, बीजुं कांई नथी. शुं कहे छे? के सोनाथी जे पानुं थाय छे ते सोनुं ज छे. ते पानुं कांई सोनीथी थयुं छे एम नथी. अहाहा! द्रष्टांत पण समजवुं कठण पडे एम छे. सोनुं वस्तु छे. एने घडतां एमांथी पानुं थाय छे. ए कार्यनुं करण-कारण सोनुं छे, सोनी नहि, कारण के करण अने कार्य अभिन्न होय छे. करण एक होय अने कार्य एनाथी भिन्न होय एम बनी शके नहि.
प्रश्नः– निमित्तथी कार्य थाय छे ने? निमित्त साधन होय छे ने?
उत्तरः– अहीं तो निमित्तनी वात ज नथी लीधी. निमित्तनो अर्थ तो ए (निमित्त) ‘छे’ बस एटलो ज छे. बाकी ए कांई साधन छे एम नथी. आकरी वात, बापु! लीधुं छे ने के-‘बीजु कांई नथी.’ एनो अर्थ ज ए छे के सोनाना पानारूपे थयुं छे ए सोनुं ज छे, तेने सोनीए कर्युं छे एम छे ज नहि. सोनुं ए करण छे अने जे पानुं थयुं ए एनुं कर्म एटले कार्य छे, कारण के कार्य अने करण बन्ने एक ज वस्तुमां होय छे.