Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 693 of 4199

 

समयसार गाथा-६प-६६ ] [ १७प

प्रश्नः– तो शुं सोनी पानाने करतो नथी?

उत्तरः– (ना). भाई, जो ते सोनीनुं कार्य होय तो सोनी साथे अभेद होय. परंतु ते सोनी साथे अभेद नथी. माटे पानुं सोनीनुं कार्य नथी. सोनाथी ते अभिन्न छे, माटे पानुं सोनानुं ज कार्य छे. वीतराग परमेश्वरनो मार्ग बहु सूक्ष्म छे, भाई! अत्यारे तो ए सांभळवा पण मळतो नथी. एने बदले आ करो ने ते करो, सामायिक करो ने प्रतिक्रमण करो-एम करो, करो, करो एवी राग करवानी वात ज बधे चाले छे.

अहीं तो एम कहे छे के-जात्रा करवानो, पूजा करवानो, दान करवानो, मंदिर बंधाववानो वगेरे करवानो जे भाव छे ते बधोय राग छे अने ते रागनुं करण पुद्गल छे. राग कार्य छे अने एनुं करण पुद्गल जड कर्म छे. अहा! चैतन्यमय जीव करण अने विकार- राग एनुं कार्य एम होई शके ज नहि. भाई! तने खबर नथी. बिचारो आखो दिवस वेपार- धंधामां गूंचाई रहे अने एम ने एम मरी जाय. एने कहे छे के-प्रभु! तने खबर नथी के-तुं कोण छो अने तारुं कार्य शुं छे? अहाहा! निर्मळानंदनो नाथ अभेद एक चैतन्यस्वरूप तुं भगवान आत्मा छो, अने जाणवा-देखवाना परिणाम थाय ते तारुं कार्य छे, पण बीजुं कोई तारुं कार्य नथी.

जुओ, आ आंगळी वळे छे ते कार्य-पर्याय छे. अने तेनुं करण परमाणु छे, आत्मा नहि. तेवी रीते पुण्य-पापना भाव छे ते कार्य छे अने तेनुं करण नाम साधन पुद्गल जड कर्म छे. अरे, भाई! तुं दुःखी छो पण तने एनी खबर नथी. जेने आत्मा शुं छे एनुं भान नथी अने परमां पोतापणुं मानीने हरखाई रह्यो छे ते भले करोडपति होय के अबजोपति, ए बिचारो भिखारी छे, दुःखी छे. ए दुःखना वेदनथी छूटवुं होय तो आत्माने रागथी भिन्न पाडवो जोईए एम अहीं कहे छे.

बापु! पैसा कयां तारा छे? ए तो जडना-अजीवना छे. अने पुत्र-स्त्री आदि परिवार पण कयां तारां छे? एनो आत्मा पण ताराथी जुदो छे अने शरीर पण जुदुं छे. तारे अने एने शुं संबंध छे? अहीं तो परमात्मा एम कहे छे के कारण अने कार्य बन्ने एक होय छे. करणनो अर्थ कारण पण थाय छे. जेमके सोनुं कारण छे अने जे पानुं थाय छे ए तेनुं कार्य छे. पानुं छे ते सोनानुं कार्य छे, सोनीनुं नहि. परमाणुमां करण नामनो गुण छे. ए करण नामना गुणने कारणे पानारूप कार्य थाय छे, सोनीथी नहि के हथोडाथी नहि.

तेवी रीते जीवस्थानो-एकेन्द्रियपणुं, बेइन्द्रियपणुं, त्रणइन्द्रियपणुं, चारइन्द्रियपणुं, पंचेन्द्रियपणुं, संज्ञी के असंज्ञीपणुं, बादर तथा सूक्ष्म, पर्याप्त-अपर्याप्त-सर्व पुद्गलमयी नामकर्मनी प्रकृतिओ वडे कराय छे. आठ कर्ममां एक नामकर्म छे. तेमां एक प्रकृति छे जे प्रकृतिना कारणे पर्याप्त-अपर्याप्त, सूक्ष्म-बादरनी दशा उत्पन्न थाय छे. आ जे नामकर्म