Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१८० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३

अहीं आत्मानी व्याख्या चाले छे के आत्मा कोने कहेवो? जे शुद्ध ज्ञानघन अभेद चैतन्यमय वस्तु छे ते आत्मा छे. एवा आत्मा उपर द्रष्टि आपतां एनुं वास्तविक स्वरूप अनुभवमां आवे छे, अने जन्म-मरण मटे छे. अहीं कहे छे के पर्याप्त, अपर्याप्त, एकेन्द्रिय, द्वि-इन्द्रिय आदि जे भेदो पडे छे ते बधां पुद्गलनां-जड नामकर्मनी प्रकृतिनां कार्य छे. ते कार्यने जे पोतानुं माने छे ते अजीवने जीव माने छे, ए रखडवाना-परिभ्रमणना पंथे छे. जेम पर्याप्त-अपर्याप्त आदि चौद जीवस्थान लीधां तेम गंध, रस, स्पर्श, रूप, शरीर, संस्थान अने संहनन पण पुद्गलमय नामकर्मनी प्रकृतिओनुं कार्य छे. पुद्गलथी अभिन्न छे तेथी जेम जीवस्थानोने पुद्गलना कह्या छे तेम उपरना बधा भावो पुद्गलमय छे एम समजवुं. माटे वर्णादिक जीव नथी एवो निश्चयनयनो सिद्धांत छे. अर्थात् पर्याप्त, अपर्याप्त आदि जे जीवनी विकारी अशुद्ध दशा छे ते बधुं पुद्गलनुं कार्य छे पण आत्मानुं नहि. आत्मा तो अनादि-अनंत अखंड एकरूप शुद्ध चैतन्यमय ध्रुव वस्तु छे. तेमां अंतर्द्रष्टि करी एकाग्र थतां आत्मज्ञान थाय छे अने जन्म-मरण मटे छे. आत्मा जन्म-मरण अने जन्म-मरणना भाव रहित त्रिकाळी शुद्ध ज्ञानघन वस्तु छे. एमां द्रष्टि करतां परिपूर्ण आत्मा जणाय छे अने त्यारे धर्मनी शरुआत थाय छे.

हवे, आ अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः-

* समयसार कळश ३८ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *
येन जे वस्तुथी अत्र यद् किंचित् निर्वर्त्यते जे भाव बने, तत् ते भाव

तद एव स्यात् ते वस्तु ज छे, कथञ्चन कोई रीते अन्यत् न अन्य वस्तु नथी; इह जगतमां जेम रुक्मेण निर्वृत्तम् असिकोशं सोनाथी बनेला म्यानने रुक्मं पश्यन्ति लोको सोनुं ज देखे छे, कथञ्चन कोई रीते न असिम् तरवार देखता नथी.

अहाहा! जेम सोनाथी बनेलुं म्यान सोनुं ज छे पण तलवार नथी तेम पुद्गलथी बनेला आ राग-द्वेष, पुण्य-पापना भाव पुद्गल ज छे, आत्मा नथी. बोलवामां एम आवे के सोनानी तलवार छे. परंतु तलवार तो लोढानी छे, सोनानी नथी. सोनानुं तो म्यान छे. तेम भगवान आत्माने शरीरवाळो, पुण्यवाळो, दया-दानवाळो कहेवो ए सोनानी म्यानमां रहेली तलवारने ‘सोनानी तलवार’ कहेवा जेवुं छे. जेम सोनानुं तो म्यान छे, तलवार नहि; तेम पुण्य-पापना भाव तो पुद्गलना छे, आत्माना नहि. छतां तेने आत्माना मानवा ते मिथ्यात्व छे, अज्ञान छे. अने ते ज ८४ लाखना अवतारमां भटकवानो रस्तो छे. भाई! दया, दान, व्रत, भक्ति, आदि शुभभावने जे पोताना माने छे ते अजीवने जीव माने छे केमके ए भाव पुद्गलमय छे, आत्मरूप नथी.

रंग-राग तथा गुणस्थान, लब्धिस्थान आदि भेदना भावो छे ते पुद्गलना संगे थयेला छे. माटे ते बधाय पुद्गलना छे, चैतन्यमय जीवना नथी. तेओ जीवना छे एम