Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-६प-६६ ] [ १७९

प्रश्नः– तो पछी अमारे धंधो-वेपार करवो के नहि?

उत्तरः– ए करे छे ज कयां? अज्ञानथी एम माने छे के हुं धंधो-वेपार करी शकुं छुं. धंधो-वेपार के ते संबंधी जे पापभाव थाय ते तारुं-आत्मानुं कार्य ज नथी. पछी करवुं के न करवुं ए सवाल ज कयां रह्यो? अहो! वीतराग परमेश्वरनो मार्ग कोई अलौकिक छे!

जेम सुवर्णनुं पानुं सुवर्ण वडे ज करातुं होवाथी सुवर्ण ज छे, बीजुं कांई नहीं. बीजुं कांई नहि एटले के ते सोनी वगेरेनुं नथी एम अनेकान्त छे. तेम आ बधा जीवस्थानना भेदो नामकर्मनी प्रकृति वडे कराता होवाथी पुद्गल ज छे, जीव नथी. भगवान आत्मा तो ज्ञायकस्वरूपी चैतन्यमूर्ति प्रभु छे. तेना परिणाम तो तेना आश्रये सम्यक्दर्शन-ज्ञान-चारित्रना निर्मळ परिणाम थाय ते छे. अहा! मोक्षनो मार्ग ते कार्य अने भगवान आत्मा कारण छे. तेम व्यवहाररत्नत्रयनो राग कार्य अने पुद्गल तेनुं कारण छे, पण जीव नहीं. बापु! आ तो वीतराग परमेश्वरनो मार्ग छे. आवी वात बीजे कयांय नथी.

आ पर्याप्त, अपर्याप्त आदि जीवना जे भेदो पडे छे ते बधायनुं कारण नामकर्मनी प्रकृति छे. ए भेदो नामकर्मनुं कार्य छे पण भगवान आत्मानुं-चैतन्यनुं ए कर्म नथी. जीव माताना उदरमां आव्या पछी आहार, शरीर, आदि छ पर्याप्ति बांधे छे. अहीं कहे छे के ए पर्याप्ति आदिनुं कार्य आत्मानुं नथी पण ए नामकर्मनी प्रकृतिनुं कार्य छे. सम्यग्द्रष्टि जीव माताना उदरमां आवे छे त्यारे ते एम जाणे छे के आ पर्याप्ति बांधवानुं काम मारुं नथी. मारुं कार्य तो मात्र जाणवानुं छे. अहा! हुं त्यां पर्याप्तिमां नथी अने जे विकल्प थयो छे एमां पण हुं नथी. ए विकल्प पण मारुं कार्य नथी, पण पुद्गलनुं कार्य छे.

अने आ वात तो आगमप्रसिद्ध छे एम कहे छे. अर्थात् सिद्धांतमां वीतरागदेवे आम ज कह्युं छे. त्रिलोकनाथ परमेश्वरे दिव्यध्वनिमां जे कह्युं छे एना परथी आगम-परमागमनी रचना थई छे. ते सर्वज्ञदेवना कहेला आगममां एम कह्युं छे के नामकर्मने कारणे पर्याप्त- अपर्याप्त आदि भेद छे. आत्माने लईने ए भेद नथी. तथा अनुमानथी पण आम जाणी शकाय छे. जडनां कार्य जडने कारणे छे एम अनुमानथी पण जाणी शकाय छे, कारण के प्रत्यक्ष देखवामां आवता शरीरादि जे भावो छे ते मूर्तिक छे अने ते मूर्त पुद्गलमय एवी कर्मप्रकृतिओनुं कार्य छे. जे मूर्त छे एनुं कारण मूर्त होय एम कहे छे. आवो उपदेश कठण पडे, पण भाई! आ मनुष्यपणुं चाल्युं जाय छे, हों! अने जो आ भेदज्ञाननुं काम मनुष्यना अवतारमां न कर्युं तो ढोरना अवतारमां अने मनुष्यना अवतारमां फेर शुं रह्यो? आवुं दुर्लभ मनुष्यपणुं पामीने भवना अभावनी वात जाण्या विना भवना भावो कर्या ज करीश तो अवतार एळे जशे, भाई!