Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 696 of 4199

 

१७८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३

प्रश्नः– पैसानुं दान तो आपी शकाय ने?

उत्तरः– कोण आपे के कोण दे? भाई! तने शुं खबर नथी के कारण अने कार्य जुदा न होय? कार्यनुं कारण अने कारणनुं कार्य सदाय एकमेक अभिन्न ज होय छे. आ जे पैसा जवानी क्रिया थाय छे तेनुं कारण जड रजकणो छे अने जे जवानी क्रिया छे ते जड रजकणोनुं कार्य छे, ए आत्मानुं कार्य नथी.

प्रश्नः– परंतु एमां आत्मा निमित्त तो छे ने?

उत्तरः– निमित्त निमित्तमां छे. निमित्तथी ए कार्य थयुं छे एम नथी. जुओने, शुं कह्युं छे? के निश्चयनये एटले के सत्यद्रष्टिए एटले के सत्यने सत्य तरीके जाणवुं होय तो, कर्म एटले कार्य अने करण अर्थात् कारण बन्ने एक होय छे. अहा! निमित्तकारणनी तो अहीं वात ज करी नथी. एनी तो अहीं उपेक्षा ज करी छे.

जुओ, आ लाकडी छे ते पुद्गल छे अने एनुं ऊंचुं थवुं ए तेनुं कार्य छे. ए पुद्गलनुं कार्य छे परंतु आंगळी जे निमित्त छे एनुं ए कार्य नथी. आंगळी तो जुदी-भिन्न चीज छे. भाई! गळे उतरवुं कठण पडे एवी वात छे केमके सत्य कयारेय सांभळ्‌युं नथी ने जे सांभळ्‌युं छे ते बधोय कुधर्म सांभळ्‌यो छे अने अज्ञानी एमां ज धर्म मानीने संतोष ले छे. अहीं तो भगवान कहे छे के समोसरणमां त्रणलोकना नाथनां दर्शन थाय एवो जे शुभभाव छे ते मारुं र्क्तव्य छे एम माननार मूढ मिथ्याद्रष्टि छे. महाविदेह क्षेत्रमां सीमंधरादि वीस तीर्थंकर- भगवान बिराजे छे. तेमनी पूजानो भाव आवे ते राग छे. ए राग आत्मानुं कर्म नथी. आवी वात छे. भाई! तुं कयारे समजीश? आ समज्या विना अनादिथी नरक अने निगोदना भव करी करीने तुं रखडी मर्यो छे. ए निगोदमां एक श्वासमां अढार भव कर्या छे. भाई! तने तारा भान विना आवा भव थया छे. अहीं तो कहे छे के निश्चयथी भव अने भवना भाव थवा ए तारुं-चैतन्यमय जीवनुं कार्य नथी. हवे पछी कलशमां कहेशे के एमां तो पुद्गल ज नाचे छे.

निश्चय नाम सत्यद्रष्टिए अर्थात् वस्तुनुं जेवुं स्वरूप छे एवा स्वरूपनी द्रष्टिए जोईए तो कारण अने कार्य बन्ने एकमेक छे.

प्रश्नः– एमां निमित्तकारण तो आव्युं नहि?

उत्तरः– भाई! निमित्तनुं कार्य अने निमित्तनुं करण एनामां (निमित्तमां) छे.

प्रश्नः– पण निमित्त तो मेळववुं पडे ने?

उत्तरः– बापु! निमित्तने कोण मेळवे? भाई! तुं तो चैतन्यसूर्य छो ने! तो ए चैतन्यसूर्य शुं करे? जे थाय तेने पोतानामां एटले निज चैतन्यस्वभावमां रहीने जाणे. आवुं जे कोई माने तेनो संसार टकी शके ज नहि.