Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१८६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३

अहीं तो एम सिद्ध कर्युं छे के पुद्गल जे निमित्त छे तेनुं आ रागादि कार्य छे. आ तो निमित्तथी कार्य थयुं एम आव्युं. आमां उपादानथी कार्य थाय छे ए कयां गयुं? अरे, भाई! कई अपेक्षाए कह्युं छे ए तो समज. ए तो निमित्तना आश्रये राग थाय छे माटे तेनो छे, एम कही एक पुद्गलनी ज रचना जाणो-एम कह्युं छे. ए पुद्गलनुं कार्य छे पण चैतन्यस्वभावनुं कार्य नथी एम अपेक्षा बताववी छे. आत्मा वस्तु छे ए तो शुद्ध चैतन्यघन आनंदघन एकली पवित्रतानो पिंड प्रभु छे. तेथी एमांथी अपवित्र राग कयांथी रचाय? भाई! आ मनुष्यदेह चाल्यो जाय छे हों! ते पाछो कयारे मळशे? जो आ न समज्यो तो रखडवाना रस्ते जवुं पडशे. त्यां पछी कोईनी सिफारस काम नहि लागे.

अहीं कहे छे के ए वर्णादि सर्व भावो एक पुद्गलना ज छे. एकस्य हि पुद्गलस्य हि एम शब्द छे. एक पुद्गलनी ज रचना जाणो एम कहे छे. आ कई अपेक्षाए कह्युं छे? रागनी रचना तो पर्यायमां पोताना ऊंधा पुरुषार्थथी थाय छे माटे रागनुं परिणमन जीवनुं छे, जीवमां छे अने तेमां कर्म निमित्त छे. कर्म निमित्त छे, पण ए निमित्त छे माटे राग थाय छे एम नथी. आ एक सिद्धांत छे. ज्यारे अहीं बीजा सिद्धांतथी कहे छे के रागनो आत्मा र्क्ता नथी. आत्मामां अर्क्ता नामनो गुण छे तेथी रागने करवानो तेनो स्वभाव नथी. माटे रागनी रचना पुद्गलद्रव्यथी छे पण जीवथी नहि. पुद्गल करण छे अने राग एनुं कार्य छे, केमके ते बन्ने अभिन्न छे. अहीं वस्तुना स्वभावनी-चिदानंद-स्वरूप भगवाननी द्रष्टि कराववी छे. अने वस्तु छे ए तो एकलो चैतन्यघनपिंड अकषायस्वभावनो रसकंद छे. ए कषायना भावने करे ए केम बने? अकषायस्वरूपमां कषायना भावनुं करवापणुं छे ज नहि, माटे आ रागादि छे ए पुद्गलनी रचना छे माटे एनी द्रष्टि छोडी दे. अहाहा! कहे छे के पर्यायबुद्धिनो त्याग कर अने त्रिकाळी वस्तुस्वभावनी द्रष्टि कर. भाई! आ कांई वादविवादे पार पडे एम नथी. खेंचताण छोडीने ‘ज्यां ज्यां जे जे योग्य छे तहां समजवुं तेह’ ए न्याये यथार्थ समज केळववी जोईए.

आ जीव-अजीव अधिकार चाले छे. त्यां जीव एने कहीए के जे अखंड अभेद एकरूप चैतन्यघनस्वरूप होय, एनी द्रष्टि करतां सम्यग्दर्शन-धर्मनुं प्रथम सोपान प्रगट थाय छे. आवा शुद्ध जीवनी द्रष्टि कराववा अहीं रंग-राग अने भेदना भावो एक पुद्गलनी ज रचना जाणो एम कह्युं छे. अहीं तो आत्मा-द्रव्यनो पूर्ण स्वभाव बताववो छे. परंतु ज्यारे पर्यायनी वात होय त्यारे पर्यायमां जीव पोते एकलो राग करे छे अने पुद्गल तो एमां निमित्तमात्र छे एम कहेवामां आवे छे. निमित्तथी राग थाय छे एम नथी. विकारना परिणमनमां परकारकनी अपेक्षा नथी एम पंचास्तिकायमां पर्यायनी अस्ति सिद्ध करी छे. तथा ज्यारे राग थाय छे त्यारे निमित्त होय छे एवुं प्रमाणज्ञान