Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 703 of 4199

 

समयसार गाथा-६प-६६ ] [ १८प आश्रये उत्पन्न थता सम्यग्दर्शन विना व्रत, तप, दान, भक्तिना शुभभाव ए चारित्र नथी. भाई! करोडो रूपिया दानमां आपी मंदिर बंधावे, भगवाननी प्रतिष्ठा करावे अने भगवाननी पूजा-भक्ति करे, पण ए बधो शुभभाव राग छे, चारित्र नथी. अहीं तो एने पुद्गलना कार्यरूप कह्यो छे.

भगवान! एकवार सांभळ. भेदमां अने रागमां तारो महिमा नथी. भगवाननी भक्ति-पूजाना भावमां तारो महिमा नथी. हुं भगवाननो मोटो भक्त, पूजारी अने आरती उतारनारो एम तुं तारो बहारथी महिमा करे, पण भाई! अंदर तारा आनंदना नाथनो महिमा एथी मटी जाय छे ए तो जो. बहु झीणी वात, भाई! अनंतकाळमां ८४ना अवतार करतां करतां हजी सुधी आ वात समज्यो नथी. अनंतवार कागडा अने कूतराना भव कर्या अने मनुष्य थई कदाचित् बहारथी साधु पण थयो, पण अंदर रागनी क्रियाथी ज धर्म मान्यो तेथी द्रष्टि मिथ्या ज रही अने तेना फळमां नरक-निगोदना ज भव प्राप्त थया. भाई! ए राग अने भेदना भावोथी चिदानंद भगवान हाथ नहीं आवे. ए रंगथी मांडी गुणस्थान पर्यंतना र९ बोलथी कहेला सर्व भावो एकस्य हि पुद्गलस्य एक पुद्गलनी ज रचना छे एम कह्युं छे.

प्रश्नः– आमां एकांत नथी थतुं? पंचास्तिकायनी ६२मी गाथामां तो राग थाय छे ते पोताथी ज थाय छे एम आवे छे; तथा जयसेनाचार्यनी टीकामां तो एम आवे छे के जीवनुं अशुद्ध उपादान अने कर्म निमित्त एम बे कारणोथी राग थाय छे?

उत्तरः– पंचास्तिकायनी ६२मी गाथामां तो रागनी पर्यायनुं स्वतंत्र अस्तित्व सिद्ध कर्युं छे. राग जीवनी पर्यायमां थाय छे ए पर्यायनुं त्यां अस्तित्व जणाव्युं छे. तथा श्री जयसेनाचार्ये उपादान-निमित्त एम जे बे कारण कह्यां ते प्रमाणज्ञान कराववा कह्यां छे. ज्यारे अहीं तो स्वभावनी द्रष्टिनी अपेक्षाए ए बन्ने वातने बाजुए मूकीने वर्णादि भावोने पुद्गलना कह्या छे. द्रव्यस्वभाव बताववो छे ने!

वळी ज्ञानी र्क्तानयनी अपेक्षाए एम जाणे छे के जे रागनुं परिणमन छे ते मारामां छे, मारा कारणे छे. ए तो ज्ञान एम जाणे छे के मारी पर्यायनुं एटलुं अस्तित्व छे. परंतु ए त्रिकाळी द्रव्यनुं कार्य छे के ए द्रव्यनुं स्वरूप छे एम नथी. अहा! एक बाजु आत्मा रागनो अर्क्ता छे एम कहे अने वळी पाछुं रागनुं परिणमन छे ते पोतानुं छे एम ज्ञानी-समक्तिी जाणे! केवी वात! वळी अहीं कहे छे के रागना जे परिणाम छे ते पुद्गलनी साथे संबंध राखे छे तेथी एकला पुद्गलथी रचाया छे. भाई! ज्यां जे अपेक्षाथी कथन होय त्यां ते अपेक्षाथी समजवुं जोईए. जे अपेक्षा होय तेने न समजे अने एकांत ज पकडीने बेसे तो सत्य हाथ नहि आवे, भाई!