Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१८४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३

भाई! अंदर तुं अनंतगुणनो भंडार पूर्णानंदनो नाथ प्रभु छो ने! पण केम बेसे? कारण के अनादिकाळथी एक समयनी पर्याय उपर ज एनी द्रष्टि पडी छे. एक समयनी दशाने ज एणे पोतानुं स्वरूप मान्युं छे. पण पर्याय छे ए तारुं तत्त्व नथी. पर्याय आत्मा नथी. व्यवहारनय भले एने आत्मा कहे, पण निश्चयथी भगवान पूर्ण-चैतन्यघन, एकला आनंदनुं दळ, अनाकुळ शांतिनो रसकंद जे त्रिकाळ ध्रुवपणे छे ते आत्मा छे. अनादि-अनंत ध्रुव चैतन्यपणे टक्ता तत्त्वने भगवान आत्मा कहे छे. एनी द्रष्टि करवी ए सम्यग्दर्शन छे. भाई! एनी द्रष्टि करवा माटे तारे निमित्त परथी, राग उपरथी अने भेदना भाव उपरथी द्रष्टि उठावी लेवी पडशे. अंदरमां एकमात्र अखंड अभेद एकरूप चैतन्यमूर्ति चिदाकार भगवान छे एनी द्रष्टि करवी ए सम्यग्दर्शन छे. धर्मनी शरूआत ज अहींथी (सम्यग्दर्शनथी) थाय छे. भाई! चारित्र तो बहु दूरनी वात छे. अहाहा! द्रष्टिमां जे अभेद चिदानंदमय चीज प्रतीतिमां आवी एमां ज रमवुं, ठरवुं, स्थित थई जवुं एनुं नाम चारित्र छे. देहनी क्रिया के व्रतादिना क्रियाकांड ए कांई चारित्र नथी. ए तो सौ पुद्गलनां कार्य छे अने पुद्गल एमनुं कारण छे एम अहीं कहे छे.

त्रणलोकना नाथ तीर्थंकरदेव परमात्मा श्री सीमंधर भगवान हमणां महाविदेहमां बिराजे छे. तेमनुं एक करोड पूर्वनुं आयुष्य छे अने प०० धनुष्यनो देह छे. लाखो जीवोनी सभामां तेओ आ ज वात फरमावे छे. संवत ४९ मां श्री कुंदकुंदाचार्यदेव त्यां गया हता अने आठ दिवस रहीने दिव्यध्वनि सांभळी हती. तेओ तो ज्ञानी, धर्मी अने निर्मळ चारित्रवंत हता. पोतानी पात्रताने लईने विशेष निर्मळता थई हती, त्यांथी भरतक्षेत्रमां पाछा आवीने तेमणे आ शास्त्रो रच्यां छे. बापु! मार्ग तो आ ज छे, भाई! सनातन वीतरागनो पंथ आ ज छे. बाकी बधा तो वाडा बांधीने बेठा छे अने पोतपोतानी मान्यतामां जे आव्यो तेने धर्म माने छे. पण ए कांई धर्म नथी. आकरी वात छे, पण शुं थाय!

अहीं कहे छे के वर्णादिकथी मांडीने गुणस्थान सुधीना बधाय भावो, अरे चोथुं, पांचमुं अने तेरमा गुणस्थान सुधीना बधा भेदो पण, पुद्गलना कारणे छे. अहाहा! भगवान आत्मा अनंतगुणधाम अनादि-अनंत स्वसंवेद्य अविचळ प्रभु छे. ते अतीन्द्रिय आनंद अने ज्ञानना वेदनथी जणाय एवी चीज छे, पण भेदना के रागना आश्रये जणाय एवी चीज नथी. मूळ चीज जे अभेद चैतन्यमय नित्यानंद प्रभु छे तेनी द्रष्टि थया विना कोईने पण त्रणकाळमां सम्यग्दर्शन थतुं नथी. तथा ज्यां सम्यग्दर्शन नथी त्यां सम्यग्ज्ञान अने सम्यक्चारित्र होतां नथी. विना सम्यग्दर्शन जेटला पण व्रत, तपादिना शुभरागना क्रियाकांड छे ते बधा थोथेथोथां छे, एकडा विनानां मींडां जेवा छे, वा वर विनानी जान जेवा छे. जेम वर विनानी जान ते जान नथी, तेम त्रिकाळी सच्चिदानंदस्वरूप भगवान आत्माना