Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-६प-६६ ] [ १८३ पुद्गलना कार्यने-पुण्य-पापना भावोने पुद्गल ज कहेवाय छे, जीव नहीं. लोको तो व्रत पाळवां, दया पाळवी, जूठुं न बोलवुं, ब्रह्मचर्य पाळवुं इत्यादिने ज पोतानुं सर्वस्व मानी बेठा छे. तेमने अहीं कहे छे के प्रभु! सांभळ. आ बधी पंचमहाव्रतनी वृत्तिओ छे ते राग छे, आस्रव छे अने ए पुद्गलनुं कार्य छे. चिदानंदघन छे स्वरूप जेनुं एवा आत्मानुं ए कार्य नथी. भाई! तारे सुखना पंथे-धर्मना पंथे जवुं होय तो चैतन्यमात्र पूर्णानंदघनस्वरूप वस्तु अंदर छे तेमां जा, तेनो स्वीकार करीने तेमां ज एकाग्र थई जा, अने भेद, राग अने निमित्तनुं लक्ष छोडी दे.

भाई! दया, दान, व्रत, तप, इत्यादि रागमां धर्म मानीने तुं संतुष्ट थयो छे पण ए तारो मिथ्या अभिप्राय छे. भगवान! तुं भूलमां भरमाई गयो छे. ए विकल्प-रागनी वृत्तिनुं जे उत्थान छे ते चैतन्यना घरनी चीज नथी. प्रभु! तारा चैतन्यघरमां रागनी वृत्ति ऊठे एवी कोई शक्ति नथी. आत्मा अनंत शक्तिओनुं संग्रहस्थान-गोदाम छे. एमां एवी कोई शक्ति- गुण नथी जे विकारने-रागने उत्पन्न करे. अहाहा! चिदानंदघनस्वरूप वस्तुमां तो गुणोनी एकरूप निर्मळ धारा वहे, पण रागनी धारा वहे एवो आत्मा नथी. आवुं कदी सांभळ्‌युंय न होय अने एम ने एम जिंदगी आंधळे-बहेरी (भान विना) चाली जाय. भाई! एथी भवभ्रमण न मटे. अहाहा! अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंत आनंद, अनंत वीतरागता, अनंत स्वच्छता एवी अनंत पूर्ण शक्तिओनुं आत्मा संग्रहस्थान छे. ए रागनुं स्थान नथी. तो एमांथी पुण्य-पापनुं उत्थान केम थाय? पुण्य-पाप उपजे एवुं चैतन्यनुं-आत्मानुं स्वरूप ज नथी ने.

तथापि कोई अज्ञानी एम कहे के अमने तो भक्तिथी ज कल्याण थशे. देव अने गुरुनी अर्पणताथी भक्ति करीए एटले तेओ अमने तारी देशे. परंतु भाई! कोण गुरु? तारो गुरु तो तुं ज छो. तने तारी समजणथी आत्मज्ञान थाय छे माटे तुं पोते ज तारो गुरु छो. अहाहा! आत्मा पोते ज पोतानो गुरु अने पोते ज पोतानो देव छे. ते पोते ज तीर्थ अने पोते ज तीर्थधाम छे. बाकी बधी तो बहारनी व्यवहारनी वातो छे. आ बाह्य देव-गुरु-तीर्थ तो मात्र पुण्यनां कारण (निमित्त) छे. अहाहा! भगवान त्रणलोकना नाथ जिनेन्द्रदेव, इंद्रो अने गणधरो तथा करोडो देवो अने राजेन्द्रोनी सभामां जे वात करता हता ते आ वात छे. भाई! सांभळ तो खरो के आ शुं चीज छे! एने सांभळ्‌या विना साची समजण कयांथी आवशे? तारुं लक्ष त्यां केम जशे? श्रीमदे कह्युं छे के-

‘लक्ष थवाने तेहनो, कह्यां शास्त्र सुखदाय.’

आ शास्त्र तो आत्मानुं-पोतानुं लक्ष कराववा माटे कह्यां छे. गुरु अने देव पण तेनुं- एक आत्मानुं ज लक्ष करावे छे.