१८८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ पंचमकाळ छे ने! भाई! समय बदलतां वस्तुनुं स्वरूप कांई बदलतुं नथी. वीतरागनो पंथ तो सदाय एक ज छे. श्रीमद राजचंद्रे कह्युं छे ने के-
राग अने द्वेषना परिणामने पुद्गलना केम कह्या? एक तो तेओ नीकळी जाय छे अने बीजुं तेओ जीवना स्वभावमय नथी माटे तेमने पुद्गलना कह्या छे. परंतु ते कर्मना ज छे अने निमित्तथी ज थाय छे एम एकांते (पर्यायने) सिद्ध करवा जशो तो द्रव्य ज उडी जशे. परंतु पर्याय (स्वतः) सिद्ध छे. पर्यायमां जे रागनी सिद्धि छे ते एनुं उपादान छे अने एमां पर निमित्त छे. परकारकनी अपेक्षा विनानुं एनुं परिणमन अनादिथी सिद्ध छे. ज्यां बे कारणथी कार्य थाय एम कह्युं होय त्यां जोडे निमित्त छे एनुं ज्ञान कराववा कह्युं छे. खरेखर कार्य तो एकथी (उपादानथी) ज थयुं छे. एकथी ज कार्य थयुं छे ए द्रष्टिमां राखीने, निमित्तथी थयुं छे एम व्यवहारथी कहेवामां आवे छे. ज्यारे अहीं तो ए बन्ने वातने उडाडीने वस्तुना स्वभावनी द्रष्टि करावी छे.
एक समयनी पर्यायमां जे राग-भेदादि भावो थाय छे ते पुद्गलनुं ज निर्माण छे केमके ते चैतन्यस्वरूप वस्तुमां नथी. वस्तु तो त्रिकाळी शुद्ध चैतन्यघन सच्चिदानंद-स्वरूप भगवान छे. ए विकार अने भेदनुं कारण केम थाय? तेथी निमित्तने आधीन थयेला राग अने भेदना भावो पुद्गलनी ज रचना छे एम जाणो एटले अनुभवो एम कह्युं छे. आत्मामां अनंत गुण तो बधा निर्मळ-पवित्र छे. एमां कोई गुण के शक्ति एवां नथी के विकार करे. तेथी ज ४७ शक्तिना वर्णनमां निर्मळ क्रमबद्धपर्यायने ज जीवनी लीधी छे. त्यां अशुद्धता लीधी ज नथी, केमके शक्ति शुद्ध छे तो एनुं परिणमन शुद्ध ज होय छे. अशुद्धता छे एनुं तो बस ज्ञान थई जाय एटलुं ज. आवो वीतरागनो माल छे ते संतो आडतिया थईने जाहेर करे छे, आपे छे.
त्रणलोकना नाथ परमात्मा जिनेश्वरदेव, गणधरो अने इंद्रोनी सभामां एम कहेता हता के वस्तुमां जे राग अने भेदना भावो पर्यायमां थाय छे ते पुद्गलनुं कार्य छे एम जाणो. ए तारुं-आत्मानुं कार्य नथी. अहाहा! प्रभु! कारणपरमात्मा तो जे निर्मळ परिणमन थाय एनुं कारण छे. ‘ततः’ माटे ‘इदं’ आ भावो ‘पुद्गलः एव अस्तु’ पुद्गल ज हो, ‘न आत्मा’ आत्मा न हो. जुओ, पहेलां ‘हि’ कह्युं हतुं अने अहीं पण ‘एव’ पद लगाडयुं छे. व्रत, तप, भक्ति, आदि रागथी कल्याण थशे एम माननारने बहु आकरुं पडे एवी वात छे. पण भक्ति आदि तो विकल्प छे, आत्मा नथी;