समयसार गाथा-६प-६६ ] [ १८९ ‘यतः’ कारण के ‘सः विज्ञानघनः’ आत्मा तो विज्ञानघन छे, ज्ञाननो पुंज छे. अहाहा! प्रभु! तुं तो चैतन्यना तेजना नूरनुं पूर छो ने! तुं रागनुं कारण केम होई शके? अष्टसहस्रीमां पण आवे छे के शुभाशुभ भाव अने भेद आत्मा न हो, पण पुद्गल ज हो. आ अनेकान्त छे. आत्मा तो विज्ञानघन प्रभु ज्ञाननो पुंज छे. ए विज्ञानघन वस्तुमां राग अने भेद कयांथी आवे?
‘ततः’ तेथी ‘अन्यः’ आ वर्णादिक भावोथी अन्य ज छे. विज्ञानघनस्वरूप भगवान आत्मा वर्णादि भावोथी अन्य एटले अनेरो-जुदो ज छे. आवुं वस्तुस्वरूप छे.
[प्रवचन नं. १०८-१०९ * दिनांक २७-६-७६ अने २८-६-७६]