Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 67.

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* गाथा–६७ *
शेषमन्यद्वयवहारमात्रम्–
पज्जत्तापज्जत्ता जे सुहुमा बादरा य जे चेव।
देहस्स जीवसण्णा सुत्ते ववहारदो उत्ता।। ६७ ।।
पर्याप्तापर्याप्ता ये सूक्ष्मा बादराश्च ये चैव।
देहस्य जीवसंज्ञाः सूत्रे व्यवहारतः उक्ताः।। ६७ ।।

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हवे, आ ज्ञानघन आत्मा सिवाय जे कांई छे तेने जीव कहेवुं ते सर्व व्यवहारमात्र छे एम कहे छेः-

पर्याप्त अणपर्याप्त, जे सूक्षम अने बादर बधी
कही जीवसंज्ञा देहने ते सूत्रमां व्यवहारथी. ६७.

गाथार्थः– [ये] जे [पर्याप्तापर्याप्ताः] पर्याप्त, अपर्याप्त [सूक्ष्माः बादराः च] सूक्ष्म अने बादर आदि [ये च एव] जेटली [देहस्य] देहने [जीवसंज्ञाः] जीवसंज्ञा कही छे ते बधी [सूत्रे] सूत्रमां [व्यवहारतः] व्यवहारथी [उक्ताः] कही छे.

टीकाः– बादर, सूक्ष्म, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पंचेन्द्रियपर्याप्त, अपर्याप्त-ए देहनी संज्ञाओने (नामोने) सूत्रमां जीवसंज्ञापणे कही छे, ते परनी प्रसिद्धने लीधे, ‘घीना घडा’नी जेम व्यवहार छे-के जे व्यवहार अप्रयोजनार्थ छे (अर्थात् तेमां प्रयोजनभूत वस्तु नथी). ते वातने स्पष्ट कहे छेः-

जेम कोई पुरुषने जन्मथी मांडीने मात्र ‘घीनो घडो’ ज प्रसिद्ध (जाणीतो) होय, ते सिवायना बीजा घडाने ते जाणतो न होय, तेने समजाववा “जे आ ‘घीनो घडो’ छे ते माटीमय छे, घीमय नथी” एम (समजावनार वडे) घडामां ‘घीना घडा’ नो व्यवहार करवामां आवे छे, कारण के पेला पुरुषने ‘घीनो घडो’ ज प्रसिद्ध (जाणीतो) छे; तेवी रीते आ अज्ञानी लोकने अनादि संसारथी मांडीने ‘अशुद्ध जीव’ ज प्रसिद्ध छे, शुद्ध जीवने ते जाणतो नथी, तेने समजाववा (-शुद्ध जीवनुं ज्ञान कराववा) “जे आ ‘वर्णादिमान (वर्णादिवाळो) जीव’ छे ते ज्ञानमय छे, वर्णादिमय नथी” एम (सूत्र विषे) जीवमां वर्णादिमानपणानो व्यवहार करवामां आव्यो छे, कारण के ते अज्ञानी लोकने ‘वर्णादिमान जीव’ ज प्रसिद्ध छे.