समयसार गाथा-६७ ] [ १९१
जीवो वर्णादिमज्जीवजल्पनेऽपि न तन्मयः।। ४० ।।
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[कुम्भः घृतमयः न] घडो छे ते घीमय नथी (-माटीमय ज छे), [वर्णादिमत्–जीव–जल्पने अपि] तो तेवी रीते ‘वर्णादिवाळो जीव’ एम कहेतां पण [जीवः न तन्मयः] जीव छे ते वर्णादिमय नथी (-ज्ञानघन ज छे).
निश्चयथी घडो घी-स्वरूप नथी; घी घी-स्वरूप छे, घडो माटी-स्वरूप छे; तेवी रीते वर्ण, पर्याप्ति, इन्द्रियो इत्यादि साथे एकक्षेत्रावगाहरूप संबंधवाळा जीवने सूत्रमां व्यवहारथी ‘पंचेन्द्रिय जीव, पर्याप्त जीव, बादर जीव, देव जीव, मनुष्य जीव’ इत्यादि कहेवामां आव्यो छे छतां निश्चयथी जीव ते-स्वरूप नथी; वर्ण, पर्याप्ति, ईन्द्रियो इत्यादि पुद्गलस्वरूप छे, जीव ज्ञानस्वरूप छे. ४०.
आत्मा तो विज्ञानघन-ज्ञाननो घन पिंड छे. ए ज्ञानघन सिवाय बीजुं जे कांई छे ते वर्ण, गंध, शरीर, मन, वाणी, इन्द्रिय, दया, दान, आदि भावो-ते बधायने जीव कहेवा ए सर्व व्यवहारमात्र छे-एम हवे कहे छे.
जीवने बादर, सूक्ष्म, एकेन्द्रियादि कह्यो छे ए व्यवहारथी एटले जूठी द्रष्टिए कह्यो छे एम अहीं कहे छे, कारण के बादर, सूक्ष्म आदि तो देहनी संज्ञा-देहनुं नाम छे. तेथी सूत्रमां ज्यां एकेन्द्रियादिने जीवनी संज्ञापणे कह्या छे त्यां व्यवहारथी-असद्भूत व्यवहारनयथी कह्या छे.
अनादिथी अज्ञानीने परनी प्रसिद्धि छे. पुण्य-राग आत्मा छे एवुं अनादिथी अज्ञानीने प्रसिद्ध छे. तेथी एम समजाव्युं के राग ते आत्मा. पण खरेखर राग ते आत्मा नथी. अहा! पुण्यनो भाव जे रागमय छे ते आत्मा नथी. आत्मा तो ज्ञानमय छे. घीना घडानी जेम व्यवहारथी समजाव्युं छे, परंतु ए व्यवहार अप्रयोजनार्थ छे. व्यवहार प्रयोजनने सिद्ध करतो नथी माटे ते अप्रयोजनार्थ छे. शुं कह्युं? के ‘राग ते आत्मा’ एम कहेवुं ते अप्रयोजनभूत छे कारण के एथी कांई प्रयोजन सिद्ध थतुं नथी.