१९२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ तेवी रीते गुणस्थान, जीवस्थान, मार्गणास्थान आदिमां आत्मा तन्मय नथी. तेथी तेमने जीवना कहेवा ते अप्रयोजनार्थ छे, जूठुं छे, कारण के एथी कांई प्रयोजन सिद्ध थतुं नथी. कळशटीकामां कळश ३९मां लीधुं छे के-“कोई आशंका करे छे के कहेवामां तो एम ज कहेवाय छे के ‘एकेन्द्रिय जीव, बे इन्द्रिय जीव’ इत्यादि; ‘देव जीव, मनुष्य जीव’ इत्यादि; ‘रागी जीव, द्वेषी जीव’ इत्यादि, उत्तर आम छे के कहेवामां तो व्यवहारथी एम ज कहेवाय छे, निश्चयथी एवुं कहेवुं जूठुं छे.” वळी कळशटीकामां कळश ४०मां पण ए ज द्रढ कर्युं छे के-“आगममां गुणस्थानोनुं स्वरूप कह्युं छे त्यां ‘देव जीव, मनुष्य जीव, रागी जीव, द्वेषी जीव’ इत्यादि घणा प्रकारे कह्युं छे, पण ते सघळुंय कहेवुं व्यवहारमात्रथी छे; द्रव्यस्वरूप जोतां एवुं कहेवुं जूठुं छे.”
राग-द्वेषादि भावो छे तो पोतामां तेओ पर्यायमां अस्ति छे तेथी सत्य छे. परंतु तेओ जीवद्रव्यमां कयां छे? तेओ अजीवपणे भले हो, पण तेओ आत्मा नथी. आ दया, दान, व्रत, तप, भक्ति आदिना जे विकल्प ऊठे छे ते आत्मा छे एम व्यवहारथी-जूठी द्रष्टिथी कह्युं छे. एनाथी भगवान! तुं भरमाई गयो? व्यवहार द्वारा निश्चय ओळखाव्यो छे अर्थात् रागद्वारा आत्मा ओळखाव्यो छे; त्यां तुं रागने ज चोंटी पडयो के राग ते आत्मा! भाई! आत्मा तो त्रिकाळी ध्रुव ज्ञायकमूर्ति भगवान विज्ञानघन प्रभु छे. ए भूतार्थ एटले सत्यार्थ छे. ए द्रष्टिनो विषय छे अने एमां द्रष्टि करतां सम्यग्दर्शन थाय छे. आ सिवाय दया, दान, आदि अनेक विकल्पवाळो जीवने कहेवो ए व्यवहार छे अने व्यवहार छे ए असत्यार्थ छे कारण के तेमां (विकल्पमां) जीव तन्मय नथी.
प्रश्नः– प्रवचनसार (गाथा १८९)मां तो एम आवे छे के निश्चयथी शुभाशुभ भावोनो-पुण्य-पापना भावोनो आत्मा र्क्ता अने भोक्ता छे? तथा प्रवचनसार गाथा ८मां एम कह्युं छे के शुभ, अशुभ के शुद्धपणे परिणमतो जीव एमां तन्मय छे?
उत्तरः– भाई! ए तो पर्यायमां शुभाशुभ भावोथी एकरूप छे एटलुं बताववुं छे. तेथी त्रिकाळी द्रव्य एमां तन्मय छे एम नथी. त्यां तो पर्याय ते समयमां ते-रूपे परिणमी छे एम वर्तमान पर्याय पूरती वस्तुनी स्थिति सिद्ध करवी छे. परंतु अहीं तो एकला त्रिकाळीने-द्रव्यने सिद्ध करवुं छे. त्रिकाळी द्रव्य जे आत्मा ए तो शुद्ध विज्ञानघन भगवान छे. ए कदीय शुभाशुभभावोपणे थयो ज नथी. तथापि शुभाशुभपणे थयो छे एम कहेवुं ए व्यवहार छे, जूठी द्रष्टि छे. समयसारनी छठ्ठी गाथामां आवे छे के भगवान आत्मा शुभाशुभभावना स्वभावे परिणम्यो ज नथी. एटले शुं? के ज्ञायकस्वभावी आत्मा जो शुभाशुभना स्वभावे परिणमे तो जड अचेतन थई जाय. भाई! आ भक्ति अने महाव्रतादिना जे शुभभाव छे ते जड अचेतन छे, केमके एमां चैतन्यनुं किरण नथी. त्यां प्रवचनसारमां पर्यायनी अपेक्षाए तन्मय छे एम कह्युं तथा अहीं द्रव्यनी अपेक्षाए तन्मय नथी एम सिद्ध कर्युं छे.