समयसार गाथा-६७ ] [ १९३
प्रवचनसारनी १८९मी गाथामां जे एम कह्युं छे के निश्चयथी आत्मा रागनो र्क्ता अने भोक्ता छे त्यां तो स्वतः राग करे छे अने स्वतः भोगवे छे एम अभिप्राय छे. परनी परिणतिने जीवनी कहेवी ते व्यवहारनय अने पोतानी परिणतिने पोतानी-जीवनी कहेवी ते निश्चयनय एम त्यां अर्थ छे.
प्रश्नः– तो पछी जीव रागने करे छे अने नथी करतो ए बन्नेमांथी साचुं शुं?
उत्तरः– भाई! अपेक्षाथी बन्ने वात साची छे. प्रवचनसारना ज्ञेय अधिकारमां वस्तुनी पर्याय सिद्ध करी छे त्यारे अहीं द्रव्य सिद्ध कर्युं छे. द्रव्यद्रष्टिथी जोतां वस्तु जे ज्ञायकमात्र भाव छे एमां राग छे ज नहि. तेथी तो छट्ठी गाथामां कह्युं के ज्ञायकभाव शुभाशुभभावोना स्वभावे परिणमतो नथी. पंडित श्री जयचंदजीए कौंसमां ‘ज्ञायकभावथी जडभावरूप थतो नथी’ एम एनो खुलासो कर्यो छे. अहाहा! ज्ञायक, ज्ञायकपणे फीटीने कदीय अचेतन थतो ज नथी. भाई! शुभाशुभभाव छे ते अचेतन छे. जो ज्ञायकभाव तेमना स्वभावे परिणमे तो ते अचेतन थई जाय. भाई! आवो वीतराग सर्वज्ञनो मार्ग घणो गंभीर-ऊंडो छे, घणो फळदायक छे.
व्यवहारना रसियाने तो आ वात एवी लागे के जाणे एना सर्व व्यवहारनो लोप थई गयो. भाई! ए ज वात अहीं कहे छे के आत्मामां व्यवहार-रागादि छे ज नहि. जे आत्माने अंतरमां स्वीकारवो छे ए तो एकलो विज्ञानघन सच्चिदानंदमय ज्ञाननो पुंज असंख्यप्रदेशी प्रभु छे, एमां शुभाशुभ भावो कयां छे? (नथी ज). तो ए शुभाशुभपणे केम थाय? (न ज थाय). भाई! एने शुभाशुभभावोवाळो कहेवो ए तो असद्भूत व्यवहारनयनुं कथन छे. ११मी गाथामां आव्युं छे ने के जे राग जणाय छे ते असद्भूत उपचार व्यवहारनयनो विषय छे अने जे राग (अबुद्धिपूर्वकनो) नथी जणातो ए असद्भूत अनुपचार व्यवहारनयनो विषय छे. छे तो बन्ने असद्भूत व्यवहार, अने व्यवहार बधोय अभूतार्थ छे केमके ते अभूत अर्थने प्रगट करे छे. ए ज वातने विस्तारथी स्पष्ट करे छेः-
जेमके कोई पुरुषने जन्मथी मांडीने मात्र ‘घीनो घडो’ ज प्रसिद्ध छे अर्थात् घीथी जुदो घडो एणे कदीय जोयो नथी तेथी ‘घीनो घडो’ ज जेने जाणीतो छे एवा पुरुषने समजाववा “जे आ ‘घीनो घडो’ छे ते माटीमय छे, घीमय नथी.” एम कहेवामां आवे छे. अहाहा! भाषा तो जुओ! ‘आ घीनो घडो छे ते माटीमय छे’ ए तो समजमां आवे छे. हवे ए द्रष्टांत अहीं आत्मा उपर घटाववुं छे. शब्द तो एम कह्यो के ‘घीनो घडो,’ ज्यारे बताववुं एम छे के घडो माटीमय छे. कारण के घी विनानो खाली घडो एणे जोयो नथी तेथी समजाववा एम कह्युं के ‘आ घीनो घडो छे ते माटीमय छे, घीमय नथी.’ आम घडामां ‘घीनो घडो’ एम व्यवहार करवामां आवे छे.