Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१९४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३

तेवी रीते आ अज्ञानी लोकने अनादि संसारथी मांडीने रागवाळो जीव, पुण्यवाळो जीव, भेदवाळो जीव-एम ‘अशुद्ध जीव’ ज प्रसिद्ध छे. द्रष्टांतमां ‘घीनो घडो’ प्रसिद्ध छे एम लीधुं हतुं अने सिद्धांतमां अज्ञानीने ‘अशुद्ध जीव’ ज प्रसिद्ध छे एम कहे छे. द्रष्टांतमां-पुरुष घी विनाना खाली घडाने जाणतो नथी एम लीधुं त्यारे सिद्धांतमां-अज्ञानी शुद्ध जीवने जाणतो नथी एम कहे छे. अहा! राग विनाना भगवान आत्माने अज्ञानी जाणतो नथी. तेथी हवे ते अज्ञानीने समजाववा-शुद्ध जीवनुं ज्ञान कराववा-“जे आ ‘वर्णादिमान जीव’ छे ते ज्ञानमय छे, वर्णादिमय नथी” एम कहे छे. जे ‘आ रागवाळो जीव छे ते ज्ञानमय छे’ एम कहीने निषेध कर्यो के जीव रागमय नथी. ‘आ रागादिमय जीव छे ते ज्ञानमय छे’ एम शा माटे कह्युं? कारण के अज्ञानीने राग विनानो जीव प्रसिद्ध नथी. तेथी तेने रागथी समजाव्युं के-‘आ रागवाळो जीव छे ते ज्ञानमय छे, रागमय नथी.’ अज्ञानीने अनादिथी रागादि अशुद्धता ज प्रसिद्ध छे. तेथी जेम ‘घीनो घडो माटीमय छे, घीमय नथी,’ तेम ‘आ रागादिवाळो जीव छे ते ज्ञानमय छे, रागादिमय नथी’ एम अज्ञानीने समजाव्युं छे. आमां ‘रागवाळो’ एम कहीने व्यवहार दर्शाव्यो अने ‘ज्ञानमय’ कहीने निश्चय कह्यो. एटले के जीव निश्चयथी ज्ञानमय ज छे अने व्यवहारथी तेने रागवाळो कहेवामां आवे छे. शब्द तो एम छे के ‘रागवाळो जीव,’ पण बताववुं एम छे के जीव ज्ञानमय ज छे. हवे ज्यां जीव ज्ञानमय ज छे त्यां रागथी एने लाभ थाय एम कयांथी सिद्ध थाय? (न ज थाय).

प्रश्नः– शुभभावने निश्चयनो साधक कह्यो छे ने?

उत्तरः– भाई! शुभभावने साधक कह्यो छे ए तो आरोपित कथन छे. जो राग निश्चयथी साधक होय तो आ गाथाना कथन साथे विरोध आवे. रागवाळो आत्मा छे ज नहि एम अहीं कह्युं छे. जो रागवाळो आत्मा छे ज नहि तो पछी राग आत्माने स्वानुभवमां मदद करे ए वात कयांथी आवे?

प्रश्नः– पंचास्तिकायमां व्यवहारनो शुभराग निश्चयनो साधक छे एम कह्युं छे. तमे एने मानो छो के नहि?

उत्तरः– भाई! अहीं तो एम कहे छे के राग छे ते निश्चयथी जीव छे ज नहि, अने जे जीव नथी ते जीवने लाभ केम करे? (न ज करे). आत्मा शुद्ध चैतन्यमय चिदानंद भगवान प्रभु छे. स्वभावना लक्षे उत्पन्न थती निर्मळ परिणतिथी ए साध्य छे. स्वभावथी प्राप्त जे निर्मळ परिणति ते साधक छे. भाई! रागने तो सहकारी जाणी निर्मळ परिणतिना साधकपणानो एमां आरोप आप्यो छे. अहा! शास्त्रोना अर्थ समजवा भारे कठण छे!

एक बाजु कहे के आत्मानी साथे राग तन्मय छे अने वळी अहीं कहे छे के आत्मा एनाथी तन्मय नथी! आ केवुं! भाई! पर्यायनी अपेक्षाए शुभराग साथे आत्मा