समयसार गाथा-६७ ] [ १९प तन्मय छे एम प्रवचनसारमां (गाथा ८मां) कह्युं छे. ज्यारे अहीं त्रिकाळी शुद्ध द्रव्यनी अपेक्षाए शुभराग आत्मा साथे तन्मय नथी एम कह्युं छे. पंचास्तिकायमां व्यवहारने साधक कह्यो छे ए आरोपित कथन छे. ज्यारे अहीं-राग छे ते निश्चयथी जीव नथी तो ते साधन केम थाय?-एम कहे छे. अहा! लोकोने आकरी लागे तेवी वात छे, पण जे छे ते एम ज छे.
शंकाः– अमे तो गुरुने पकडया छे. बस, हवे ते अमने तारी देशे. अमारे हवे कांई करवानुं नथी. आ स्वमत छे के परमत छे एनी परीक्षा पण अमारे करवी नथी.
समाधानः– भाई! कोण गुरु? प्रथम तो पोते ज पोतानो गुरु छे. शुद्ध चैतन्यमय निज आत्माने पकडे, एनो आश्रय करे तो तराय एम छे, बापु! पर गुरु तारी देशे ए तो बधी व्यवहारनी वातो छे. चारित्रपाहुडनी १४मी गाथामां आवे छे के वेदांतादि अन्यमतमां माननाराओ प्रति उत्साह थवो, भावना थवी, एमनी सेवा-प्रशंसा करवी अने एमनामां श्रद्धा थवी ए बधां मिथ्यात्वनां लक्षण छे. आकरी वात, प्रभु! पण आ तो वीतराग सर्वज्ञ परमेश्वर जेमना चरणोने इन्द्रो अने गणधरो चूमे छे एमनो आ मार्ग छे. सांभळवा मळवो पण मुश्केल. परंतु जेमने आत्मा जोवो-अनुभववो होय ए बधायने आ मार्गमां आववुं पडशे. आवी वात छे.
अहाहा! शैली तो जुओ! कहे छे के अज्ञानीओने अनादिथी अशुद्ध जीव ज प्रसिद्ध छे. तेथी ‘अशुद्ध-रागवाळो जीव छे ते ज्ञानमय छे, रागमय नथी’ एम तेने समजाव्युं छे. अहाहा! ‘ज्ञानमय छे, रागमय नथी’ एम कहीने अशुद्धता उडावी दीधी छे. अरे! हजी जेने श्रद्धाननां पण ठेकाणां नथी एने वळी आचरण केवां? कदाच ते व्यवहार करे-पाळे तोपण ते सर्व आचरण संसार खाते ज छे, केमके राग छे ते संसारमां ज प्रवेश करावनार छे. अहीं स्पष्ट कहे छे के-व्यवहारवाळो-रागवाळो जीव छे ते निश्चयमय-ज्ञानमय ज छे, व्यवहारमय- रागमय नथी. अहाहा! परम अद्भुत वात छे.
वस्तु अनादि-अनंत शुद्ध विज्ञानघन ध्रुवप्रवाहरूप छे. जेम पंथ चाल्यो जाय छे तेम भगवान आत्मा ध्रुव-ध्रुव-ध्रुव एम प्रवाहरूपे शुद्ध चैतन्यमय छे. तेमां एक समय पूरतो रागनो संबंध छे. हवे आ रागना संबंध विनानो जीव जेणे जोयो नथी एवा अज्ञानी जीवने समजावती वखते आ व्यवहार कह्यो के-‘रागना संबंधवाळो जीव.’ पण निश्चयथी एक समयनो राग ए वस्तुना स्वभावमां नथी. रागनो-संसारनो संबंध ज एक समय पूरतो छे. तेथी एटलो संबंध देखीने, जेणे संबंधरहित शुद्ध जीव जोयो नथी तेने बताव्युं के-‘आ रागना संबंधवाळो जीव ज्ञानमय छे, रागमय नथी.’ अहा! वातने केवी सिद्ध करी छे! आ ‘दयाना भाववाळो जीव’ एम व्यवहारथी कह्युं; पण जीव दयाना भावमय नथी पण ज्ञानमय ज छे. अहा! शुं शैली! व्यवहार समजाववा