१९६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ माटे आवे छे पण ते निश्चयनी अपेक्षाए जूठो छे एम कहे छे. बीजो कोई उपाय नथी तेथी व्यवहारथी समजाववामां आवे छे. आवो उपदेश छे!
आ प्रमाणे सूत्र विशे जीवमां वर्णादिमानपणानो व्यवहार करवामां आव्यो छे, कारण के अज्ञानी जीवने रंग-राग-वाळो ज जीव प्रसिद्ध छे. पर्यायबुद्धिवाळा जीवोने रागवाळो जीव ज प्रसिद्ध छे. एक समयनी पर्यायनी पाछळ अंदर आखुं परिपूर्ण वस्तुनुं चैतन्यदळ पडेलुं छे, परंतु पर्यायनी रमतमां जीवने राग ज जणाय छे अने तेथी ते पर्यायबुद्धि छे. तेने समजावतां कहे छे के ‘पर्यायमां रागवाळो जीव छे ते ज्ञानमय छे, रागमय नथी.’ पर्यायनी पाछळ तो आखो चैतन्यघन पडयो छे ने! शक्ति अने स्वभावनो पिंड प्रभु विज्ञानघन छे. एमां वर्तमान पर्यायनो प्रवेश नथी. अरे! निर्मळ पर्यायना पण प्रवेशनो अवकाश नथी एवो ए घन प्रभु छे. अहा! निर्मळ पर्याय पण विज्ञानघन आत्मानी उपर तरे छे.
अहीं अज्ञानीने एम कहे छे के प्रभु! एक वार सांभळ. तने शुद्ध आत्मा जाणीतो नथी, माटे जाणीती चीजथी-रागथी तने कह्युं के ‘आ रागवाळो जीव.’ आटलुं कहीने ‘ते रागमय’ छे एम नथी कह्युं, पण ‘ते ज्ञानमय’ छे एम कह्युं छे. ‘आ रागवाळो जीव’ एम तने जे ख्यालमां छे ते जीव ज्ञानमय छे. अहाहा! शुं उपदेश छे!
प्रश्नः– आमां करवानुं शुं आव्युं?
उत्तरः– भाई! सत्य समजण करी साचुं श्रद्धान करवुं. अहाहा! वस्तु शुद्ध चैतन्यघनस्वरूप आत्मा छे ते तरफ ढळवुं, वळवुं अने एमां ज रमवुं ए करवानुं छे.
आठमी गाथामां कह्युं छे के गमे तेवो होशियार जीव होय तोपण आत्माने समजाववो होय तो व्यवहार द्वारा समजावाय छे. त्यां ‘दर्शन-ज्ञान-चारित्रने जे हंमेशा प्राप्त होय ते आत्मा’ एम व्यवहार कह्यो छे. ज्यारे अहीं ‘रागवाळो जीव’ एम कहीने ‘ते ज्ञानमय छे, रागमय नथी’ एम कह्युं छे. पोताना ज्ञान-दर्शन-चारित्रने अर्थात् निर्मळ पर्यायने प्राप्त करे ते आत्मा एम समजाववा माटे व्यवहार कह्यो, परंतु ए व्यवहार कहेनारने (तथा सांभळनारने) अनुसरवा लायक नथी. भाई! आ तो जेने आत्मानुभव करवो होय एनी वात छे.
हवे आ ज अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः-
‘चेत्’ जो ‘घृतकुंभाभिधाने अपि’ ‘घीनो घडो’ एम कहेतां पण ‘कुंभः घृतमयः न’ घडो छे ते घीमय नथी, माटीमय ज छे. घी तो संयोगी चीज छे. ए कांई माटीना स्वभावमय चीज नथी. घीनी साथे तो माटीनो घडो संयोग संबंधे छे. तेम