समयसार गाथा-६७ ] [ १९७ भगवान आत्मा शुद्ध विज्ञानघनस्वरूप छे अने एने पर्यायमां राग साथे एक समय पूरतो संयोग संबंध छे. परंतु आ संबंध त्रिकाळी द्रव्यमां नथी. ‘घीनो घडो’ कहेतां जेम घडो घीमय नथी, माटीमय ज छे तेम ‘वर्णादिमत् जीव–जल्पने अपि’ ‘वर्णादिवाळो जीव-रंग-रागवाळो जीव एम कहेवा छतां पण ‘जीवः न तन्मयः’ जीव छे ते वर्णादिमय नथी-रंग-रागमय नथी, पण ज्ञानघन ज छे. जेम घडो अने घी बे एक नथी, तद्न भिन्न छे, तेम राग अने भगवान आत्मा तद्न भिन्न छे. रंग-गंध आदि जे र९ बोल लीधा छे ते बधायमां जीव तन्मय नथी.
प्रवचनसारमां कह्युं छे के शुभभाव साथे जीव तन्मय छे अने अहीं कहे छे के ‘जीवः न तन्मयः’ जीव तन्मय नथी तो ए केवी रीते छे?
भाई! ए तो पर्यायमां तन्मय छे एनी वात प्रवचनसारमां छे. राग पर्यायमां थाय छे, ते बीजे थाय छे के अद्धरथी छे एम नथी. राग जे थाय छे ते पर्यायमां नथी एम नथी. त्यां तो एनुं परिणमन सिद्ध करवुं छे तेथी एम कह्युं छे के शुभथी परिणमतां शुभ, अशुभे परिणमतां अशुभ अने शुद्धे परिणमतां शुद्ध आत्मा छे. त्यारे अहीं कहे छे के-पर्यायमां राग हो तो हो, परंतु द्रव्यना स्वभावमां राग तन्मय नथी. अहाहा! जीव छे ते रंग-रागमय नथी पण शुद्धज्ञानघन ज छे.
घडो जेम माटीमय ज छे, ‘माटीवाळो’ एम पण नहि. ‘माटीमय’ ज छे, तेम भगवान आत्मा ज्ञानमय-ज्ञानघन ज छे. आत्मा ज्ञाताद्रष्टाना स्वभावथी तन्मय छे, एकमेक छे, पण रागथी तन्मय नथी. तेवी रीते जीव, जीवस्थान, मार्गणास्थान, संयम-लब्धिस्थान आदि भेदोथी तन्मय नथी. अहाहा! गजब वात छे! छेल्ले ६८मी गाथामां कहेशे के गुणस्थानथी पण तन्मय नथी. अहाहा! रंग-रागथी आत्मा तन्मय नथी ए तो ठीक, पण संयमलब्धिनां स्थान जे विकासरूप निर्मळ चारित्रना भेदरूप छे एनाथी पण आत्मा तन्मय नथी. अभेद वस्तुमां भेदनो अंश तन्मय थतो ज नथी. कषायनी मंदतानां विशुद्धिस्थानो असंख्य प्रकारनां छे. भगवान आत्मा ते प्रशस्त शुभ रागनां स्थानोथी तन्मय नथी. अज्ञानीए शुभ राग विनानो आत्मा कदी जाण्यो नथी. तेने कहे छे के-‘शुभरागवाळो जीव छे ते ज्ञानमय छे.’ एम कहीने जीवने यथार्थ ओळखाव्यो छे. जेम घडो माटीमय ज छे तेम जीव शुद्धज्ञानघन ज छे. आवी वात छे.
घीथी भरेला घडाने व्यवहारथी ‘घीनो घडो’ कहेवामां आवे छे. छतां निश्चयथी घडो घी-स्वरूप नथी. व्यवहारथी कहेवाय छे ए तो कथनमात्र छे. व्यवहारथी कह्यो माटे घडो कांई घीमय थतो नथी, पण घडो तो माटीमय ज रहे छे. अहा! घी घी-रूप छे