Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१९८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ अने घडो माटीमय ज छे. तेवी रीते वर्ण, पर्याप्ति, इन्द्रियो इत्यादि साथे एकक्षेत्रावगाहरूप संबंधवाळा जीवने सूत्रमां व्यवहारथी ‘पंचेन्द्रिय जीव, पर्याप्त जीव, बादर जीव, देव जीव, मनुष्य जीव ‘इत्यादिरूपे कहेवामां आव्यो छे, छतां निश्चयथी जीव ते-स्वरूप नथी. देवस्वरूपे, मनुष्यस्वरूपे खरेखर जीव नथी. जीवनुं ए वास्तविक स्वरूप नथी.

देवगति के जे उदयभाव छे ते जीव छे एम व्यवहारथी कह्युं छे कारण के अज्ञानीने तेनी प्रसिद्धि छे. परंतु ‘आ देव जे जीव छे ते ज्ञानमय छे, देवमय नथी’ एम अहीं कहे छे. आ देव-मनुष्य आदि गतिनी अर्थात् उदयभावनी वात छे, शरीरनी नहि. देव-मनुष्य आदिना शरीर साथे तो जीवने कांई संबंध नथी, ए तो प्रत्यक्ष जड छे. एनी वात नथी. अंदर जे गतिनी योग्यता देव-मनुष्यादिनी छे तेने व्यवहारथी आ देव जीव, मनुष्य जीव, एकेन्द्रिय जीव, द्विइन्द्रिय जीव, पर्याप्त जीव, अपर्याप्त जीव इत्यादि जीवपणे कहेवामां आवे छे. छतां निश्चयथी जीव ते-स्वरूप नथी. अरे, संयमलब्धिस्थानना भेदरूप पण ज्ञायक नथी. जो ते लब्धिस्थानना भेदथी तन्मय होय तो कयारेय एनाथी भिन्न पडे नहि. परंतु अनुभूतिमां तो ए भेद आवता नथी, भिन्न रहे छे. माटे जीव राग के भेदना स्वरूपे छे ज नहि, ए तो एकमात्र शुद्ध विज्ञानघन ज छे.

प्रश्नः– आ तो बहु ऊंची वात छे.

उत्तरः– बापु! तारी मोटप आगळ आ कांई ऊंची वात नथी. भाई! तारी मोटपनी शी वात कहेवी? सर्वज्ञदेवनी वाणीमां पण तारुं पूरुं स्वरूप आवी शकयुं नथी. आवो तुं भगवान आत्मा अनंत ज्ञानमय, दर्शनमय, आनंदमय, वीतरागतामय, स्वच्छतामय, प्रभुतामय छे. एने वर्णादिना भेदवाळो कहेवो ए व्यवहार छे, जूठी द्रष्टि छे. अहा! एक समय माटे भेदादिपणे पर्याय जणाय छे तोपण त्रिकाळी शुद्ध द्रव्य भेदादिपणे थयुं ज नथी. आत्मा त्रिकाळी ज्ञानमय भूतार्थ वस्तु छे. ए रागथी कदीय तन्मय थयो ज नथी, रागथी सदा भिन्न ज छे, माटे ‘रागवाळो जीव’ एम कहीने तेने ‘ज्ञानमय’ जणाव्यो छे. आ जे दया, दान, व्रत, भक्ति आदि विकल्प-राग छे एमां चैतन्यपणुं नथी अने ए पुद्गलना संगे थयेला भावो छे तेथी एने पुद्गलनी जातना गणीने पुद्गलमय ज कह्या छे.

एक बाजु प्रवचनसारना ज्ञेय अधिकारमां राग निश्चयथी जीवनो छे एम कह्युं छे अने अहीं एने पुद्गलमय कह्यो छे. तो ए केवी रीते छे?

निश्चयथी राग-मिथ्यात्व जीवना छे, केमके पर्यायमां स्व-आश्रित पोताना ऊंधा पुरुषार्थथी राग-मिथ्यात्व थयां छे. तेथी स्वाश्रित परिणामने निश्चय गणीने तेने जीवना कह्या छे. त्यां पर्यायनी स्वतंत्रता-स्वायत्तता सिद्ध करवा एम कह्युं छे. ज्यारे अहीं द्रव्यस्वभाव सिद्ध करवो छे. कारण के द्रव्यना स्वभावमां रागादि छे नहि तेथी स्वभावनी द्रष्टिए