Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-६७ ] [ १९९ रागादिने पुद्गलना परिणाम कह्या छे. जुओ, ‘पुद्गलस्वरूप’ छे, एम स्पष्ट लख्युं छे. भगवान आत्मा विज्ञानघननो पिंड प्रभु छे. एमां रागादि नथी अने रागादि करे एवी शक्ति नथी. तेथी ए रागादि सर्व भावो अजीव पुद्गलना ज छे एम कह्युं छे. भाई आ कांई वादविवादे पार पडे एम नथी. जिनवाणीमां तो विविध अपेक्षाथी कथन होय छे ते यथार्थ समजवां जोईए.

अहीं तो एम कह्युं छे के-पुद्गल जड कर्म छे ते करण-साधन छे अने दया, दान, आदि पुण्यभाव ए एनुं कार्य छे. तेथी कोई एम कहे के जुओ, निमित्तने लईने रागादि थया के नहि? तो एम नथी. भगवान! तुं अपेक्षा समज्यो नथी. भाई! रागादि थया छे तो पोतानी पर्यायना ऊंधा पुरुषार्थथी, पण ते स्वभावमां नथी तथा निमित्तना लक्षे थया छे तेथी तेमने निमित्तमां नाख्या छे. निमित्त एक व्यवहार छे अने रागादि अशुद्धता पण व्यवहार छे. तेथी बन्नेने एक गणीने निमित्त करण अने अशुद्धता ए एनुं कार्य एम कह्युं छे. आवी वात यथार्थ समजे नहि तो सत्य केम मळे? भाई! जीव तो एने कहीए जे त्रिकाळ ध्रुव चैतन्यघनस्वरूप ज्ञानस्वरूप ज छे.

[प्रवचन नं. ११० * दिनांक २९-६-७६]