समयसार गाथा-६८ ] [ २०३
ज्ञानी जनोऽनुभवति स्वयमुल्लसन्तम्।
अज्ञानिनो निरवधिप्रविजृम्भितोऽयं
मोहस्तु तत्कथमहो बत नानटीति।। ४३ ।।
वर्णादिमान्नटति पुद्गल एव नान्यः।
रागादिपुद्गलविकारविरुद्धशुद्ध–
चैतन्यधातुमयमूर्तिरयं च जीवः।। ४४ ।।
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विभिन्नं] जीवथी अजीव भिन्न छे [स्वयम् उल्लसन्तम्] तेने (अजीवने) तेनी मेळे ज (-स्वतंत्रपणे, जीवथी भिन्नपणे) विलसतुं-परिणमतुं [ज्ञानी जनः] ज्ञानी पुरुष [अनुभवति] अनुभवे छे, [तत्] तोपण [अज्ञानिनः] अज्ञानीने [निरवधि–प्रविजृम्भितः अयं मोहः तु] अमर्यादपणे फेलायेलो आ मोह (अर्थात् स्वपरना एकपणानी भ्रान्ति) [कथम् नानटीति] केम नाचे छे- [अहो बत] ए अमने महा आश्चर्य अने खेद छे! ४३.
वळी फरी मोहनो प्रतिषेध करे छे अने कहे छे के ‘जो मोह नाचे छे तो नाचो! तोपण आम ज छे’ः-
श्लोकार्थः– [अस्मिन् अनादिनि महति अविवेक–नाटये] आ अनादि काळना मोटा अविवेकना नाटकमां अथवा नाचमां [वर्णादिमान् पुद्गलः एव नटति] वर्णादिमान पुद्गल ज नाचे छे, [न अन्यः] अन्य कोई नहि; (अभेद ज्ञानमां पुद्गल ज अनेक प्रकारनुं देखाय छे, जीव तो अनेक प्रकारनो छे नहि; [च] अने [अयं जीवः] आ जीव तो [रागादि–पुद्गल– विकार–विरुद्ध–शुद्ध–चैतन्यधातुमय–मूर्तिः] रागादिक पुद्गल-विकारोथी विलक्षण, शुद्ध चैतन्यधातुमय मूर्ति छे.
भावार्थः– रागादि चिद्दविकारने (-चैतन्यविकारोने) देखी एवो भ्रम न करवो के ए पण चैतन्य ज छे, कारण के चैतन्यनी सर्व अवस्थाओमां व्यापे तो चैतन्यना कहेवाय. रागादि विकारो तो सर्व अवस्थाओमां व्यापता नथी-मोक्ष- अवस्थामां तेमनो अभाव छे. वळी तेमनो अनुभव पण आकुळतामय दुःखरूप छे. माटे तेओ चेतन नथी, जड छे. चैतन्यनो अनुभव निराकुळ छे, ते ज जीवनो स्वभाव छे एम जाणवुं. ४४.