२०८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ छे के जूनां कर्म व्यापक थईने ते तेर गुणस्थानने-व्याप्यने करे छे. जूनां कर्म व्यापक छे अने तेर गुणस्थान तेनुं व्याप्य छे. तथा तेर गुणस्थान व्यापक थईने नवां कर्मने-व्याप्यने करे छे. तेर गुणस्थान व्यापक छे अने नवां कर्म जे बंधाय ते एनुं व्याप्य छे.
प्रश्नः– स्वद्रव्य व्यापक अने तेनी पर्याय ते व्याप्य एम व्याप्य-व्यापकपणुं स्वद्रव्यमां ज होय छे ने?
उत्तरः– भाई! त्यां (१०९ थी ११२ गाथामां) तो र्क्ता-कर्मपणुं बताववुं छे. तेथी जे गुणस्थान छे ए ज र्क्ता छे अने नवा कर्मनुं बंधन थयुं ते एनुं कर्म छे; गुणस्थान छे ते व्यापक छे अने जे कर्म बंधाय छे ते एनुं व्याप्य-अवस्था छे एम कह्युं छे. तेर गुणस्थान पुद्गल छे ते कोना र्क्ता छे? नवां कर्म बंधाय छे तेना. तेर गुणस्थान पुद्गल छे ते व्यापक थईने नवां कर्मनी अवस्था-व्याप्य करे छे. अहाहा! तेर गुणस्थानने जडनी साथे व्याप्य- व्यापक संबंध बताव्यो छे! व्याप्य-व्यापकपणुं तो स्वद्रव्यमां ज होय छे, परनी साथे व्याप्य- व्यापक संबंध होय ज नहि. पण त्यां वस्तुना स्वभावनी द्रष्टि कराववा ए प्रमाणे कह्युं छे. स्वभावनी द्रष्टि कराववाना प्रयोजनथी त्यां कह्युं के विकारभाव-शुभभाव ते र्क्ता-व्यापक अने जे नवुं कर्म बंधाय ते एनुं कर्म-व्याप्य छे. अहाहा! आवा केटला भंग पडे छे! जो साची समजण न करे तो ऊंधुं पडे एम छे.
कहे छे के पुद्गलना विपाकपूर्वक थाय छे तेथी गुणस्थान आदि पुद्गल ज छे. अने ते पुद्गलभाव (गुणस्थान आदि) व्यापक थईने नवां कर्मने बांधे छे जे एनुं व्याप्य छे. अहाहा! स्वभाव तो शुद्ध चैतन्यमय छे, तेथी ते र्क्ता अने विकार एनुं कार्य एम केम बने? (न ज बने). माटे विकारी कार्यने कर्मनुं कार्य गण्युं छे अने तेने नवां कर्मनी पर्यायनुं कारण गण्युं छे. शुं कह्युं? समजाणुं कांई? जूनां कर्म कारण-व्यापक छे अने विकार, गुणस्थान आदि भेद जे थाय छे ते तेनुं कार्य-व्याप्य छे. तथा ते विकार, गुणस्थान आदि भेद कारण छे अने नवा कर्मनी अवस्था थाय छे ते एनुं कार्य-व्याप्य छे. आम व्याप्य-व्यापकपणुं गुणस्थान आदि भेदो अने कर्म वच्चे स्थाप्युं छे कारण के र्क्ता-कर्म संबंध बताववो छे.
अहा! गुणस्थान पुद्गल ज छे, भाषा तो जुओ! प्रवचनसारनी १८९ गाथामां शुद्धनयथी राग जीवनो छे एम कह्युं छे. शुद्धनयथी एटले के स्वद्रव्यनी पर्याय-राग पोताथी पोताना आश्रये (कारणे) थाय छे, कर्मथी नहि. तेथी स्वाश्रित रागनी पर्यायने निश्चयथी जीवनी छे एम कह्युं छे. आत्मा व्यापक थईने ते शुभभावना रागनो र्क्ता थाय छे माटे शुभराग ते आत्मानुं व्याप्य छे एम त्यां (प्रवचनसारमां) कह्युं छे केमके त्यां पर्याय स्वतः सिद्ध करवी छे. ज्यारे अहीं द्रव्यस्वभाव सिद्ध करवो छे. तेथी कह्युं ने के