समयसार गाथा-६८ ] [ २०९ गुणस्थानादि कर्मना विपाकपूर्वक थाय छे तेथी पुद्गल ज छे, सदाय अचेतन छे, जीव नथी.
अहाहा! गुणस्थानोनुं पुद्गल साथे र्क्ताकर्मपणुं त्रण प्रकारे सिद्ध कर्युं छे. १. युक्ति, २. आगम, ३. अनुभवथी.
(१) एक तो ए के गुणस्थानो पुद्गलना विपाकपूर्वक थाय छे माटे पुद्गल ज छे, जीव नथी. तेमां युक्ति बतावी के जवपूर्वक जे जव थाय छे ते जव ज छे. तेम पुद्गलपूर्वक थता गुणस्थानो पुद्गल ज छे.
(२) हवे आगमथी सिद्ध करे छे के गुणस्थानोनुं सदाय अचेतनपणुं आगमथी सिद्ध छे. निश्चयना आगमनो-परमागमनो ए सिद्धांत छे के गुणस्थान अचेतन छे, पुद्गल छे, केमके ते मोह अने योगथी थयेलां छे.
प्रश्नः– आगममां तो गुणस्थान आदि भावो जीवना छे एम छे ने?
उत्तरः– भाई! ए पर्यायनी सिद्धि करनार आगम छे. ज्यारे अहीं तो वस्तुना स्वभावनी सिद्धि करनार आगमनी वात छे. आ वात पहेलां आवी गई छे. अध्यवसान आदि भावोने तमे पुद्गलना कहो छो पण सर्वज्ञना आगममां तो तेमने जीवपणे कह्या छे? तेनो उत्तर गाथा ४६मां आप्यो छे के ते भावोने व्यवहारथी जीवना कह्या छे पण निश्चयथी तेओ जीवना नथी. आ व्यवहार अने निश्चय-जेम छे तेम यथार्थ समजवा जोईए. बे प्रकार थया, हवे त्रीजो.
(३) भेदज्ञानीओ वडे चैतन्यस्वभावी आत्माथी गुणस्थानोनुं भिन्नपणुं स्वयं उपलभ्यमान छे. ४४मी गाथामां पण आ वात आवी गई छे. भगवान आत्मा चैतन्यस्वभावथी व्याप्त चिदानंदघन प्रभु छे. एनो भेदज्ञानीओ गुणस्थान आदिथी भिन्नपणे अनुभव करे छे. एटले के चैतन्यना अनुभवमां ए गुणस्थान आदि भेदो आवता नथी, भिन्न रही जाय छे.
अहाहा! चैतन्यस्वभावथी व्याप्त-प्रसरेलो प्रभु आत्मा छे. तेनो अनुभव करनार भेदज्ञानीओ वडे गुणस्थानो आत्माथी भिन्नपणे स्वयं उपलभ्यमान छे. अहाहा! ज्ञाननी जे वर्तमान पर्याय अंतरमां वळे छे ते पर्याय द्वारा, आ गुणस्थानो आत्माथी भिन्न छे एम स्वयं उपलभ्यमान थाय छे. शुं कह्युं? ज्ञानीने जे स्वानुभूतिनी परिणति थाय छे एनाथी गुणस्थानो (भेदो) भिन्न रही जाय छे, एमां गुणस्थानना भेद आवता नथी. आवी वात छे, प्रभु! आ प्रमाणे गुणस्थान आदि पुद्गलपूर्वक थवाथी पुद्गल ज छे, एक वात. आगम पण तेने पुद्गल ज कहे छे, बीजी वात. अने चैतन्यस्वभावी आत्मानो अनुभव करनार भेदज्ञानीओने पण ते गुणस्थानो स्वयं पोताथी भिन्न देखाय