२१० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ छे, तेओ अनुभवमां आवता नथी, ए त्रीजी वात. माटे तेओ सदाय अचेतन पुद्गल ज छे एम सिद्ध थाय छे. गंभीर तत्त्व छे, भाई! धीरेथी, शांतिथी एने समजवुं जोईए.
अहा! विशुद्धिस्थान एटले के असंख्य प्रकारना जे प्रशस्त शुभभाव छे ते पुद्गलना विपाकपूर्वक थया होवाथी, जवना कारणथी जेम जव ज थाय छे तेम, पुद्गल ज छे. आगम पण शुभभावने पुद्गल ज कहे छे. अने चैतन्यस्वभावथी व्याप्त भगवान आत्मानो अनुभव करनारने शुभभाव पोताथी भिन्न ज भासे छे अर्थात् अनुभूतिमां ए शुभभाव आवता नथी, भिन्न ज रही जाय छे. माटे शुभभाव पुद्गल ज छे एम सिद्ध थाय छे. थोडामां पण घणुं कह्युं छे. अहो! श्री कुंदकुंदाचार्ये अने श्री अमृतचंद्राचार्ये जैनधर्मनो धोध वहेवडाव्यो छे! कहे छे के शुभभावनो राग ए कांई जैनधर्म नथी, जैनधर्म तो एक वीतरागभाव ज छे. वीतरागी परिणति ए जैनधर्म छे, परंतु वीतरागी परिणतिनी साथे धर्मीने जे शुभभावनो राग छे ए पुद्गल छे केमके ए पुद्गलना विपाकपूर्वक थाय छे. वस्तु आत्मा तो स्वभावथी शुद्ध चैतन्यमय छे. एमां राग नथी तो एनुं कार्य केम होय? (न ज होय). तेथी ते रागनुं कार्य पुद्गलना विपाकपूर्वक थयुं होवाथी पुद्गलनुं ज छे एम कह्युं छे.
प्रश्नः– राग तो आत्मानी व्याप्य अवस्था छे ने? व्यापक आत्मानी राग व्याप्य अवस्था छे ने?
उत्तरः– भाई! अहीं चैतन्यस्वभावी आत्मानी द्रष्टि कराववी छे, तेथी पुद्गलकर्मना विपाकपूर्वक थतो होवाथी रागने पुद्गल ज कह्यो छे, केमके पुद्गल कारण थईने जे थाय ते पुद्गल होय छे. आगम-सिद्धांत पण एने पुद्गल कहे छे. तथा चैतन्यस्वभावी आत्मानो अनुभव करनार ज्ञानीने राग स्वयं भिन्नपणे जणाय छे. ज्ञाननी पर्याय अंतरमां वळतां एटले के चैतन्यस्वभावी आत्मानो अनुभव थतां, एमां रागनो अनुभव आवतो नथी पण ते भिन्नपणे स्वयं उपलभ्यमान छे. एटले शुं कह्युं? के अनुभव थतां, राग के जे पुद्गल छे ते ज्ञानमां स्वतः भिन्नपणे जणाई जाय छे. बहु सूक्ष्म वात, भाई! वस्तुनी स्थिति ज आवी सूक्ष्म छे.
आ रीते तेमनुं-गुणस्थान आदिनुं सदाय अचेतनपणुं सिद्ध थाय छे. एटले के चैतन्यस्वभावथी व्याप्त भगवान आत्मानो अनुभव करतां तेओ भिन्न रही जाय छे, अनुभूतिमां आवता नथी माटे तेओ सदाय अचेतन ज छे एम सिद्ध थाय छे. अनुभव छे ए शुद्ध ज्ञान-दर्शनना परिणाम छे. ए अनुभवमां, आ भगवाननी स्तुति, वंदना, भक्ति अने प्रभावनानो राग इत्यादि बधी हा-हो आवतां नथी पण भिन्न रही जाय छे तेथी ते पुद्गलना ज परिणाम छे. आवी वात छे, भाई!
प्रश्नः– तो बहारमां धर्मनो प्रचार करवो के नहि?