Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-६८ ] [ २११

उत्तरः– बापु! धर्म कयां बहारमां रह्यो छे? धर्मनी पर्याय तो चैतन्यस्वभावथी व्याप्त चिदानंद भगवाननी तरफ ढळतां प्रगट थाय छे, अने त्यारे शुभराग तो भिन्न रही जाय छे. भाई! जेने धर्मनी पर्याय-अनुभूति प्रगट थाय छे ते धर्मीने तो ए रागनी पर्याय पोताथी भिन्न भासे छे. अनुभवमां राग आवतो नथी एम कहे छे. अहाहा! शुभराग होय छे खरो, पण ए तो स्वथी भिन्न छे एम धर्मी जीव ज्ञान करे छे. गजब वात छे! युक्ति, आगम अने अनुभव एम त्रण प्रकारे रागादि पुद्गल ज छे एम सिद्ध कर्युं छे.

अहीं रागने पर तरीके सिद्ध करवो छे. चैतन्यस्वभावमां राग नथी एम सिद्ध करवुं छे. आत्मा व्यापक अने राग तेनुं व्याप्य एम जे आवे छे त्यां अपेक्षा जुदी छे. त्यां तो रागनी पर्याय द्रव्यनी छे, राग द्रव्यनी पर्यायना अस्तित्वपणे छे, परने कारणे रागनी उत्पत्ति थई छे एम नथी-एम सिद्ध करवुं छे. ज्यारे अहीं चैतन्यस्वभावथी व्याप्त चिदानंदस्वरूप भगवान आत्माना अनुभवमां राग भिन्न रही जाय छे माटे ते चैतन्यथी भिन्न अचेतन छे एम सिद्ध करे छेः-

प्रश्नः– तो बन्नेमांथी साचुं कयुं?

उत्तरः– (अपेक्षाथी) बन्ने वात साची छे. पर्यायनुं ज्ञान पण लक्षमां होवुं जोईए. एने पण ज्ञानी यथार्थ जाणे छे. १४ मी गाथाना भावार्थमां कह्युं छे के-‘सर्व नयोना कथंचित् रीते सत्यार्थपणानुं श्रद्धान करवाथी ज सम्यग्द्रष्टि थई शकाय छे.’ एनो अर्थ ए थयो के पर्यायमां राग छे ते खरी वात छे. पर्याय अपेक्षाए विकार क्षणिक सत् छे. परंतु चैतन्यस्वभावथी व्याप्त त्रिकाळी शुद्ध भगवान आत्मामां एक समयनो ते विकार व्याप्त नथी. पुद्गलना संगे थयेल एक समयनुं कार्य, व्यापक एवा चैतन्यस्वभावमां व्याप्युं नथी.

प्रश्नः– आ बन्नेमांथी नक्की शुं करवुं?

उत्तरः– भाई! राग पर्यायमां छे अने ते पोताथी छे एम जाणमां लईने, द्रव्य- स्वभावमां-चैतन्यस्वभावथी व्याप्त प्रभु आत्मामां राग नथी अर्थात् द्रव्यस्वभाव निर्विकार शुद्ध चैतन्यमय छे एम श्रद्धान करवुं.

र्क्ता-कर्म अधिकारनी शरूआत करवी छे तेथी आ वात अहीं लीधी छे. पहेली गाथामां आव्युं ने के-‘परिभाषण शरू करीए छीए,’ परिभाषा सूत्र एटले ज्यां ज्यां जे जे जोईए ते ते गाथा यथास्थाने त्यां आवे. समयसारनी आवी ज शैली छे. अमृतचंद्राचार्य पण जे भविष्यमां-आगळ आववानुं होय छे तेनी वात पहेलां कहे छे. जेमकेः बंध अधिकारमां आवे छे के पर जीवने जीवाडुं के मारुं-ए अध्यवसान मिथ्यात्व छे, जूठुं छे. भगवाने एनो त्याग कराव्यो छे तेथी हुं मानुं छुं के पर जेनो