२१२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ आश्रय छे एवो व्यवहार ज सघळोय छोडाव्यो छे. (कलश १७३). गाथा २७२ मां जे वात आववानी छे ते वात आगळना कळशमां (कळश १७३ मां) कही दीधी छे. आवी शैली समयसारमां लीधी छे.
अहाहा! परथी नथी थयुं ते कार्य परनुं छे, स्वनुं नथी! केवी वात! भाई! ‘परथी नथी थयुं’ ए तो रागनुं कार्य स्वथी पर्यायमां थयुं छे एम सिद्ध करवा कह्युं छे. ए पर्याय अपेक्षाए पर्यायनी वात करी छे. पण वस्तुना स्वभावने ज्यां जोईए तो ‘ते कार्य परनुं छे’ एम भासे छे. केमके त्रिकाळी शुद्ध चैतन्यमय वस्तुनो अनुभव करतां एटले के निर्मळ सम्यक्दर्शन-ज्ञानना परिणामथी द्रव्यनो अनुभव करतां, ए परिणाममां रागनुं वेदन आवतुं नथी. माटे राग छे ते परनुं कार्य छे, स्वनुं नथी. भाई! आ समयसार छे ते एम ने एम वांची जवाथी समजाय एम नथी. तेनां एक एक पद अने पंक्तिमां भाव घणा गंभीर-ऊंडा छे.
अहा! शुं वस्तुस्थिति बतावी छे! भगवान आत्मा चैतन्यस्वभावथी व्याप्त शुद्ध चिदानंदमय वस्तु छे. ते अनंत शक्ति-गुण-स्वभावथी मंडित अभेद एकाकार वस्तु छे. शुं एमां कोई शक्ति-गुण-स्वभाव छे जे विकार उत्पन्न करे? (ना). छतां पर्यायमां जे विकार थाय छे ते विकारनुं स्वतः परिणमन छे. अहाहा! स्वतः षट्कारकथी विकार परिणमे छे. तेने द्रव्य-गुण अर्थात् स्वभाववाननी अपेक्षा नथी तथा निमित्तना कारकोनी पण अपेक्षा नथी. हवे कहे छे के चैतन्यस्वभावथी व्याप्त शुद्ध आत्माने अनुभवतां, एनी निर्मळ अनुभूतिमां विकार- राग आवतो नथी, भिन्न रही जाय छे. जो ए राग चैतन्यस्वरूपमय होय तो चैतन्यनी अनुभूतिमां आववो जोईए. परंतु एम तो बनतुं नथी. माटे राग अचेतन ज छे.
अहाहा! आत्मा शुद्ध चैतन्यमय वस्तु छे. ज्यां ज्ञानना परिणाम अंदर शुद्ध चैतन्यमय वस्तुमां निमग्न थया त्यां राग स्वयं स्वथी भिन्नपणे जणाय छे. माटे राग ए जीवना परिणाम नथी. अहाहा! चैतन्यस्वभावी वस्तु आत्मामां ढळेला जे श्रद्धा-ज्ञानना निर्मळ परिणाम छे ते जीवना छे. पण ए निर्मळ परिणाम साथे राग आवतो नथी. अहाहा! ज्ञानना परिणामथी राग भिन्न ज रहे छे. ए रागनुं ज्ञान ज्ञानना परिणाममय छे, रागमय नथी. राग पोताथी भिन्न छे एवुं ज्ञान थाय छे पण ते राग अभिन्न छे एवुं ज्ञान ज्ञानना परिणाममां थतुं नथी. गजब वात! अहो! आ वीतरागनी वाणी वहेवडावनारा दिगम्बर संतो जाणे वीतरागतानां पुतळां! मुनि एटले वीतरागतानुं बिंब! धन्य ए मुनिदशा! आवा मुनिनां दर्शन थवा माटे पण भाग्य जोईए! एमनी वाणीनी शी वात!
कहे छे के भगवान! तुं चैतन्यस्वभावथी व्याप्त आत्मा छो ने! शुं तुं रागथी