समयसार गाथा-६८ ] [ २१३ व्याप्त आत्मा छो? (ना). भाई! ज्यां आत्मा व्यापक अने राग एनुं व्याप्य एम कह्युं छे त्यां तो आत्माने परथी भिन्न सिद्ध करवो छे. कलश-टीकामां पण आवे छे के रागनुं व्याप्य- व्यापकपणुं आत्मानी साथे छे, परनी साथे नहि. भाई! त्यां तो परथी भिन्न पोतानी पर्याय सिद्ध करी छे. पण अहीं तो शुद्ध चैतन्यमय आत्मानी अंदर ढळतां जे निर्मळ ज्ञान-दर्शनना- जाणवा-देखवाना परिणाम थाय छे तेमां राग आवतो नथी पण पोताथी भिन्नपणे जणाय छे एम कहे छे. माटे राग अचेतन पुद्गलनो छे एम कहे छे.
आवी वात लुखी लागे एटले अज्ञानी भगवाननी स्तुति, भक्ति, सेवा करवामां अने दान करवामां संतोष मानी ले छे. अरे प्रभु! एथी तने शुं लाभ थयो? व्यवहारथी निश्चय थाय के व्यवहार साधक छे अने निश्चय साध्य-एम जे खरेखर माने छे तेनुं तो हजी शास्त्रज्ञान पण साचुं नथी. आगमनी वास्तविक शैली शुं छे एनी पण एने खबर नथी. व्यवहारने साधक कह्यो छे ए तो आरोपित कथन छे. साधकनुं कथन बे प्रकारे छे, साधक बे प्रकारे नथी. जेम मोक्षमार्गनुं कथन बे प्रकारे छे, कांई मोक्षमार्ग बे प्रकारे नथी. जो मोक्षमार्ग बे प्रकारे होय तो व्यवहार मोक्षमार्गथी व्यवहार मोक्ष अने निश्चय मोक्षमार्गथी निश्चय मोक्ष थाय-शुं एम छे? (ना). भाई, व्यवहार मोक्षमार्ग तो बंधनुं कारण छे. पण तेने आरोपथी मोक्षमार्ग कह्यो छे. आमां तो घणुं बधुं भर्युं छे.
हवे कहे छे के जेम गुणस्थान माटे कह्युं तेम राग, द्वेष, आदि बीजा बधा बोल माटे पण लेवुं. जेमके राग-राग छे ते पुद्गलना विपाकपूर्वक थवाथी पुद्गल छे, केमके कारणना जेवुं कार्य होय छे. आगम पण रागने पुद्गल ज कहे छे अने भेद ज्ञानीओ वडे राग पोताथी भिन्नपणे उपलभ्यमान छे. माटे राग पुद्गल ज छे एम सिद्ध थयुं. आ प्रमाणे दरेक बोलमां उतारवुं.
द्वेष-द्वेषना परिणाम पुद्गलना विपाकथी थयेला होवाथी पुद्गल छे. आगम पण तेने पुद्गल कहे छे अने भेदज्ञानीओ वडे अनुभवमां पण ते भिन्नपणे उपलभ्यमान छे. माटे द्वेष पुद्गल ज छे. अहीं आगम एटले निश्चयनुं-अध्यात्मनुं आगम लेवुं. आनो खुलासो अगाउ गाथा ४६ ना संदर्भथी आवी गयो छे. अध्यवसान आदि भावोने व्यवहारथी जीवना कह्या छे, पण परमार्थनी द्रष्टिमां तेओ जीवना छे ज नहि. भाई! ‘ज्यां ज्यां जे जे योग्य छे तहां समजवुं तेह.’ पोतानी द्रष्टिने सिद्धांत कहे छे तेम वाळवी जोईए पण द्रष्टि प्रमाणे सिद्धांतने वाळवो जोईए नहि.
तेवी रीते मोह अने प्रत्यय-प्रत्यय एटले आस्रव. तेमां मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय अने योग-ए पांचेय लेवा. ए पांचेय आस्रव पुद्गलपूर्वक थया होवाथी पुद्गल छे. आगम पण एने पुद्गल ज कहे छे. तथा आत्माना अनुभवमां आस्रव