Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२१४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ स्वथी भिन्नपणे ज जणाय छे. अर्थात् शुद्ध चैतन्यस्वभावी आत्मानो अनुभव करतां अनुभवमां आस्रवो आवता नथी, पण भिन्न ज रहे छे. माटे तेओ पुद्गल ज छे.

तेवी रीते कर्म जे जड (द्रव्यकर्म) छे ते, नोकर्म-शरीर, मन, वाणी, आदि, वर्ग, वर्गणा अने स्पर्धक-आ बधा तो सीधा जड पुद्गल ज छे.

हवे कहे छे के अध्यवसानस्थान पुद्गलपूर्वक थया होवाथी पुद्गल छे. आगम पण एने पुद्गल कहे छे. अने ते अध्यवसानस्थान चैतन्यस्वभावथी व्याप्त भगवान आत्मानो अनुभव करतां भिन्न रही जाय छे, अनुभवमां आवता नथी. माटे तेओ पुद्गल ज छे.

तेवी रीते अनुभागस्थान-पर्यायमां जेटला अनुभागरसना भाव आवे ते, योगस्थान एटले कंपननां स्थान, बंधस्थान-विकारी पर्यायना बंधना प्रकार, उदयस्थान तथा मार्गणास्थान-चौद मार्गणाना भेद-सर्व पुद्गलपूर्वक होवाथी पुद्गल छे. आगम तेओने पुद्गल कहे छे अने चैतन्यस्वभावथी व्याप्त आत्मानो अनुभव करतां तेओ भिन्न रही जाय छे, माटे तेओ पुद्गल ज छे.

तेवी रीते स्थितिबंधस्थान-कर्मनी स्थितिना जे प्रकार छे तेटली जीवमां जे योग्यता छे ते पुद्गल छे. तथा संकलेशस्थान एटले अशुभभावना प्रकार-हिंसा, जूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि-जे अशुभभाव छे ते पुद्गलपूर्वक होवाथी पुद्गल छे, आगम पण तेओने पुद्गल कहे छे अने चैतन्यमूर्ति भगवान आत्मानो अनुभव करतां ते अशुभभावो अनुभूतिथी भिन्न रही जाय छे. माटे तेओ पुद्गल ज छे.

विशुद्धिस्थान-जे असंख्यात प्रकारे प्रशस्त शुभभाव छे ते पुद्गलपूर्वक होवाथी पुद्गल छे, आगम पण तेओने पुद्गल कहे छे अने शुद्ध आत्माना अनुभवमां पण तेओ आवता नथी, भिन्न रही जाय छे, माटे तेओ पुद्गल ज छे. लोकोने आ भारे कठण पडे छे. पण भाई! गमे ते शुभभाव हो, चाहे तो तीर्थंकर गोत्र बंधाय एवो सोलहकारण भावनानो शुभभाव हो, परंतु सर्व शुभभाव पुद्गलनी कर्मप्रकृतिना विपाक-पूर्वक ज होवाथी पुद्गल छे. तेओ कांई चैतन्यना विपाक-भाव नथी. भगवान चैतन्यदेवनुं कार्य तो आनंद अने वीतरागी शान्तिना अंकुर फूटे एवुं चैतन्यमय ज होय. एमां विशुद्धिस्थान आवतां नथी. माटे तेओ पुद्गल ज छे.

हवे संयमलब्धिस्थान-अभेद चैतन्यघन-विज्ञानघनस्वभावी आत्मामां निर्मळ चारित्रना जे भेद पडे छे ते संयमलब्धिस्थान छे. तेओ पण पुद्गलकर्मपूर्वक थता होईने सदाय अचेतन पुद्गल छे. आगम पण तेओने पुद्गल कहे छे अने आत्मानुभूतिमां पण ए भेदो समाता नथी, तेथी तेओ पुद्गल ज छे, जीव नथी-एम आपोआप सिद्ध थाय छे.