Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-६८ ] [ २१प

अहीं मूळ तो त्रिकाळी शुद्ध चैतन्यस्वभावथी व्याप्त ध्रुव भगवान आत्मा सिद्ध करवो छे. शुं कीधुं? के जे चैतन्यस्वभावथी व्याप्त छे ते जीव छे. तेथी चैतन्यथी भिन्न एवा राग अने भेद आदि सर्व भावो चैतन्यमय नथी माटे अचेतन छे एम कह्युं छे. तथा आ सर्व भावो पुद्गलना विपाकपूर्वक थता होवाथी पुद्गल ज छे, जीव नथी एम सिद्ध कर्युं छे. जेम पहेलां गुणस्थान जीव नथी एम सिद्ध कर्युं हतुं तेम आ रागादि बधाय भावो पण जीव नथी एम आपोआप सिद्ध थई गयुं.

* गाथा ६८ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

शुद्धद्रव्यार्थिकनयनी द्रष्टिमां एटले के जेमां शुद्ध त्रिकाळी द्रव्यनुं प्रयोजन छे एवा नयनी द्रष्टिमां चैतन्य अभेद छे. शुद्धद्रव्यार्थिकनय एटले शुद्ध + द्रव्य + आर्थिक + नय. अहाहा! आत्मा त्रिकाळ ध्रुव द्रव्य छे. एवा त्रिकाळी शुद्ध भगवान आत्मानुं ज जेमां प्रयोजन छे ए नयथी जोतां चैतन्य अभेद छे, एमां दया, दान आदि राग के संयमलब्धिस्थान आदिना भेद नथी. भाई! परमात्मा त्रिलोकीनाथ जिनेश्वरदेवे कहेलो मार्ग संतो जगतने जाहेर करे छे. कहे छे के-प्रभु! तुं शुद्ध द्रव्यनी द्रष्टिथी अभेद छो; अने त्यां ज द्रष्टि देवा लायक छे, माटे त्यां द्रष्टि दे.

अहाहा! शुद्धद्रव्यार्थिकनयथी चैतन्य अभेद छे अने एना परिणाम पण स्वाभाविक शुद्ध ज्ञान-दर्शन छे. जुओ, वस्तु अभेद छे अने तेना परिणाम निर्मळ ज्ञान-दर्शन छे. अहाहा! ज्ञाता-द्रष्टाना आनंदना जे परिणाम थाय ते शुद्ध चैतन्यना परिणाम छे. परंतु दया, दान, व्रत, तप, भक्ति आदिना जे परिणाम थाय ते जीवना परिणाम नथी; अहा! चैतन्यस्वभावनुं ए परिणमन नथी. आवी वात लोकोने सांभळवा नवराश मळे नहि अने आखो दिवस रळवा-कमाववाना धंधामां अने बायडी-छोकरां साचववामां-एकला पापना काममां गाळे! कदाचित् सांभळवा जाय तो भक्ति करो, उपवास करो आदि करो-एम सांभळवा मळे. पण भाई! ए तो बधो राग छे, अने रागने तो अहीं पुद्गलना परिणाम कह्या छे. अरे, ते पुद्गल ज छे. अरेरे! लोको तो एमां ज धर्म माने छे!

भगवान आत्मा चैतन्यस्वभावी जागृतज्योतस्वरूप अभेद एकरूप शुद्ध वस्तु छे. तेना परिणाम होय तो ते जाणवा-देखवाना अने अतीन्द्रिय आनंदना निर्मळ परिणाम छे, संयमलब्धिस्थान आदि तो भेदरूप छे, अने आत्मा अभेद छे. ए अभेदना आश्रये जे निर्मळ ज्ञान-दर्शनना परिणाम थाय ते जीवना परिणाम छे. आत्मानी पर्यायमां जे दया, दान अने काम-क्रोध आदि राग-द्वेषना विकल्पो थाय छे ते चैतन्यना विकारो छे, चैतन्यना स्वभावभाव नथी. अहाहा! विकारना परिणाम चैतन्यना स्वरूपमय नथी एम कहे छे. विकार उत्पन्न करे एवी चैतन्यमां कोई शक्ति-गुण नथी. जे विकृत पर्याय आत्मामां