२१६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ थाय छे ते पर निमित्तथी थाय छे. निमित्तथी थाय छे एटले के थाय छे तो पोताथी पोतामां, पण निमित्तना लक्षे थाय छे एम अर्थ छे.
शुं कह्युं? शुभाशुभभाव-दया, दान, व्रत, भक्ति वगेरेना शुभभाव अने हिंसा, जूठ, चोरी, विषयवासना आदि अशुभभाव-ते सर्व पर्यायमां थता चैतन्यना स्वभाव के स्वभावना परिणाम नथी. तेओ कर्मना निमित्तथी उत्पन्न थयेला छे अने चैतन्य जेवा देखाय छे. चैतन्यमय तो नथी, पण जाणे चैतन्य केम न होय एवा देखाय छे. तोपण ते चिद्विकारो चैतन्यनी सर्व अवस्थाओमां व्यापक नहि होवाथी चैतन्यशून्य छे, जड छे. शुं कह्युं? भगवान आत्मा अनादि-अनंत त्रिकाळ छे, तेनी अनादि-अनंत सर्व अवस्थाओमां ए विकारो रहेता नथी. अनादि-अनंत जे स्वभाव छे एनी पर्यायमां अनादि-अनंत विकार रहेतो नथी. आ पुण्य-पाप, शुभाशुभभाव अने गुणस्थान आदि भेदना भाव चैतन्यनी प्रत्येक अवस्थामां व्यापक नथी, माटे ए विकारो चैतन्यथी शून्य छे एटले के जड छे. तेथी तेओ कर्मपूर्वक थता होवाथी तेओने पुद्गलमां नाख्या छे. भाई! सौ प्रथम सम्यग्दर्शन अने तेनो विषय शुं छे ते समजवानी जरूर छे, बाकी बधुं तो थोथेथोथां छे.
सम्यग्दर्शन ए धर्मनुं प्रथम सोपान छे. अने एनो विषय त्रिकाळी शुद्ध अभेद चैतन्यस्वभावी वस्तु छे. शुद्धद्रव्यार्थिकनयनो विषय कहो के सम्यग्दर्शननो, बन्नेनो विषय त्रिकाळी शुद्ध चैतन्यमय भगवान आत्मा छे. अने सम्यग्दर्शन-ज्ञान आदि छे ते एना परिणाम होवाथी जीव छे. ज्यारे रागादि अने गुणस्थान आदि भेदना भावो स्वभावपूर्वक नहि होवाथी तथा निमित्त पुद्गलकर्मना विपाकपूर्वक होवाथी सदाय अचेतनपणे पुद्गल ज छे. आवी वात छे. जे कोई दया, दान, व्रत, भक्ति आदिना भावथी धर्म थवो माने छे ते मूढ मिथ्याद्रष्टि छे. तेने जैनधर्मनी खबर नथी. तेने खबर नथी एटले कांई बंधभावथी अबंध थई जाय? असत्य, सत्य थई जाय? न थाय, भाई! ए संसारमां रखडवानी मान्यता छे. जुओने! पंडित जयचंदजीए केवो खुलासो कर्यो छे! भाई! जड पुद्गलमय भावोथी जीवने- चैतन्यने केम लाभ थाय? (कदीय न थाय.)
दया, दान, व्रत, भक्ति आदिना भाव पुण्यभाव छे, अने वेपार-धंधाना, स्त्री-पुत्र- परिवार साचववाना तथा हिंसादिना भाव छे ते एकला पापभाव छे. आ पुण्य-पापना भाव छे तो जीवनी अवस्थामां थयेला विकारी परिणाम, पण तेओ चैतन्यस्वभावथी शून्य छे माटे जड-अचेतन छे अने पुद्गलकर्मपूर्वक थता होवाथी पुद्गल ज छे एम कह्युं छे. आ युक्ति थई. हवे कहे छे आगममां पण तेमने अचेतन कह्या छे. शुद्ध द्रव्यार्थिकनयनी द्रष्टिथी आगममां पण तेमने अचेतन कह्या छे. तेम ज भेदज्ञानीओ पण तेमने चैतन्यथी भिन्नपणे अनुभवे छे. आम त्रण वात थई.