Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 735 of 4199

 

समयसार गाथा-६८ ] [ २१७

पहेलां न्यायथी सिद्ध कर्युं के-भगवान आत्मा तो शुद्ध चैतन्यस्वभावी निर्मळानंद प्रभु छे. ते अभेद छे. तेनी पर्यायमां जे विकार थाय छे ते चैतन्यस्वभावपूर्वक नथी कारण के चैतन्यमां कयां विकार छे के ते-पूर्वक विकार थाय? परंतु पुण्य-पाप आदि भावोना विकार पुद्गलकर्मपूर्वक ज थाय छे. माटे तेओ चैतन्यथी रहित जड पुद्गल ज छे. आ युक्ति कही. भगवानना आगममां पण तेमने निश्चयथी पुद्गल ज कह्या छे. तथा शुद्ध अभेद चैतन्यमय आत्मानो अनुभव करनार भेदज्ञानीओने पण तेओ अनुभूतिथी भिन्न जणाय छे. आम युक्ति, आगम अने अनुभव एम त्रण प्रकारे तेओ पुद्गल ज छे एम सिद्ध थाय छे. लोकोने एकांत, लागे, पण भाई! आ तो न्यायथी, भगवानना आगमथी अने भेदज्ञानीओना अनुभवथी सिद्ध थयेली वात छे. भाई! रागथी अने भेदथी भिन्न भगवान अभेदनो अनुभव करतां, एमां राग के भेद आवता नथी. तेथी तेओ अचेतन-पुद्गल छे, जीव नथी.

लोको तो पर जीवनी दया पाळवी-तेमने न मारवा तेने अहिंसा कहे छे अने ते परम धर्म छे, सर्व सिद्धांतनो सार छे एम माने छे. तेने कहे छे के भाई! तने वस्तुनी खबर नथी. तें सत् सांभळ्‌युं ज नथी, भगवान! एकवार सांभळ तो खरो प्रभु! के तारो स्वभाव शुं छे? तुं तो चैतन्यस्वभावी ध्रुव अभेद वस्तु छो ने, नाथ! एमां विकार कयां छे ते थाय? तुं परनी दया तो पाळी शक्तो नथी, परंतु दयानो जे शुभराग तने थाय छे ते चैतन्यमय नथी पण पुद्गलकर्मपूर्वक थतो होवाथी पुद्गल ज छे एम अहीं कहे छे. अहाहा! शुं न्याय छे! न्यायथी तो समजवुं पडशे ने? भाई! आ जिंदगी चाली जाय छे, हों. आवो मनुष्यभव मळ्‌यो एमां देवाधिदेव जिनेश्वरदेव आत्मा कोने कहे छे ए समजणमां न आव्युं तो मनुष्यभव निष्फळ जशे. पशुने मनुष्यपणुं मळ्‌युं नथी अने आ जीवने मनुष्यपणुं मळ्‌युं छे. पण जो आत्मानी समजण न करी तो मनुष्यपणुं निष्फळ जशे.

अहाहा! ज्ञानानंदनो दरियो भगवान आत्मा ध्रुव चैतन्यमय वस्तु छे. ते अभेद एकरूप निर्मळ छे. एमां विकार कयां छे ते विकार थाय? एमां तो ज्ञान, आनंदना निर्मळ परिणाम थाय. ए चैतन्यना परिणाम छे.

प्रश्नः– पर्यायमां विकार थाय छे ने? ए शुं छे?

उत्तरः– भाई! पर्यायमां विकार थाय छे ए चैतन्यना परिणाम नथी केमके ते चैतन्यमय नथी, स्वभावपूर्वक नथी. ए विकार पुद्गलकर्मपूर्वक थता होवाथी अचेतन-पुद्गल छे. जो ते जीवना भाव होय तो ते नीकळे नहि अने सदाय चैतन्यनी सर्व अवस्थाओमां रहे, पण तेओ तो नीकळी जाय छे. सिद्धमां तेओ सर्वथा नथी. वळी