२१८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ भेदज्ञानीओनी निर्मळ अनुभूतिमां पण तेओ आवता नथी, भिन्न रही जाय छे. जो राग अने भेद जीवना होय तो स्व-अनुभवमां तेओ आववा जोईए. पण एम पण बनतुं नथी. तेथी तेओ अचेतन ज छे. परमागम पण एम ज कहे छे. तेथी रागादि भावो जीवना नथी, पुद्गलना ज छे एम सिद्ध थाय छे.
अहा! अज्ञानीने एम लागे छे के आ शुं कहेवाय? आ ते वळी केवो धर्म! आ बधुं- व्रत करवां, तप करवां, उपवास करवा, भगवाननी भक्ति-स्तुति-सेवा-पूजा करवी, जात्रा करवी, मंदिर बांधवां, रथयात्राओ काढवी, वगेरे कयां गयुं? शुं ए बधुं धर्म नथी? धीरजथी सांभळ, भाई! जेने तुं धर्म माने छे ए बधी क्रिया छे अने तुं तो चैतन्यस्वरूप छो, भगवान! राग छे ए तो अचेतन छे अने पुद्गलकर्मना विपाकपूर्वक थाय छे माटे एने तो भगवान निश्चयथी पुद्गलनुं कार्य कहे छे. गजब वात छे! विकार अने भेदथी रहित अभेद एकरूप चैतन्यस्वरूप भगवान आत्मा छे. रागनी आडमां जो एनी द्रष्टि न करी तो कयां जईश प्रभु? भव बदलीने कयांक जईश तो खरो ज ने? स्वरूपनी समजण विना रखडी मरीश, नरक-निगोदना चक्रावामां रखडी मरीश, भाई! बापु! अहीं विचारवानी अने समजवानी तक छे.
गाथा ४९ नी टीकामां आव्युं छे के-‘जेणे पोतानुं सर्वस्व भेदज्ञानी जीवोने सोंपी दीधुं छे’-एनो अर्थ शुं छे? के ज्ञानानंदस्वरूप भगवान आत्मानो जेओ अनुभव करे छे ते भेदज्ञानी जीवोने अनुभवमां अतीन्द्रिय ज्ञान, आनंद अने शांतिनो स्वाद आवे छे पण राग अने भेद अनुभवमां आवता नथी. मतलब के चैतन्यस्वरूप भगवान आत्माथी राग अने भेद भिन्न छे. राग अने भेदना भावो चैतन्यमय नथी अने तेथी अचेतन ज छे. लोकोने आकरुं पडे पण ए एम ज छे.
प्रश्नः– जो तेओ चेतन नथी तो तेओ कोण छे?
उत्तरः– जीवनी पर्यायमां तेओ छे तेथी व्यवहारथी तेओ जीवना छे एम कहेवामां आवे छे; परंतु निश्चयथी तेओ जीवना नथी. तेओ पुद्गलकर्मपूर्वक थाय छे तेथी निश्चयथी तेओ पुद्गल ज छे. द्रव्य-गुणमां तो विकार छे ज नहि, पर्यायमां जे विकार छे ते अनादि-अनंत पर्यायमां कायम रहेतो नथी. तेथी विकार जीवनो नथी, पुद्गल ज छे, केमके कारण जेवुं कार्य होय छे. पुद्गलकर्म कारण छे अने रागादि तेनुं कार्य छे. तेथी रागादि पुद्गल ज छे.
परंतु आ उपरथी कोई एम मानी ले के-जुओ, कर्मने लईने राग थाय छे ने? तो एम नथी. तुं यथार्थ वात समज्यो नथी, भाई! कर्मने लईने विकार थाय छे एम नथी, कर्म छे माटे राग थाय छे एम छे ज नहि. जीवद्रव्यनी पर्यायमां विकार-अपराध जे थाय छे ते पोताथी ज थाय छे. ते अपराध पोतानो ज छे परंतु ते स्वभावनुं कार्य