समयसार गाथा-६८ ] [ २१९ नथी एम अहीं कहे छे. भगवान आत्मा तो त्रिकाळ निरपराधस्वरूप निराकुळ आनंदमय निर्मळानंद प्रभु चैतन्यस्वभावी वस्तु छे. एनुं कार्य अपराध-विकार केम होय? निरपराध स्वभावमांथी अपराध-विकार केम जन्मे? तो विकार थाय तो छे? पर्यायमां ए विकार थाय छे तो पोताथी, पोतानी जन्मक्षण छे तेथी थाय छे, परंतु पुद्गलकर्मना-निमित्तना लक्षे थाय छे माटे तेओ पुद्गलना छे एम कह्युं छे. वीतरागनो मार्ग बहु झीणो, भाई! तेने धीरजथी, न्यायथी समजवो जोईए.
द्रष्टिनो विषय त्रिकाळ अभेद आत्मा छे. अभेदनी द्रष्टिमां अभेद चैतन्यस्वभाव ज जणाय छे. पर्यायमां रागादि जे छे ते अभेदनी द्रष्टिमां आवता नथी माटे तेओ अचेतन ज छे. तथा ते रागादि पुद्गलकर्मपूर्वक ज थाय छे माटे तेओ पुद्गल ज छे, जीव नथी. जवमांथी जव ज थाय, पण शुं बाजरो थाय? जव कारण अने बाजरो कार्य एम शुं बने? जवने कारणे शुं बाजरो उगे? (न ज उगे). जेम जव कारण छे तो तेनुं कार्य पण जव ज छे, तेम पुद्गलकर्मपूर्वक थयेलुं विकारनुं कार्य पण पुद्गल ज छे. माटे रागादि पुद्गल ज छे, जीव नथी एम सिद्ध थयुं-आ प्रमाणे स्वभावथी विभावनुं भेदज्ञान कराव्युं.
अंतःतत्त्व चैतन्यस्वरूप भगवान आत्मा परमात्मस्वरूप छे. अत्यारे ज परमात्मस्वरूपे बिराजमान छे, हों. ए परमात्मस्वरूपनुं कार्य शुं राग (शुभभाव) होय? ना. राग छे तो जीवनी पर्यायमां अने ते पोतानो ज अपराध छे, पण ते कांई चैतन्यस्वभावथी नीपजेलुं कार्य छे? ना. ते कारणे, द्रव्य-गुणना आश्रय विना पर्यायमां स्वयं अद्धरथी उत्पन्न थयेला रागने पुद्गलनुं कार्य कह्युं छे. पुद्गलकर्म राग करावे छे माटे पुद्गलनुं कार्य कह्युं छे एम नथी, पण कर्म-निमित्तना लक्षे राग थाय छे माटे पुद्गलनुं कार्य कह्युं छे. ए रागादि भाव स्वभावनी उपर-उपर ज रहे छे अने पुद्गलकर्मना निमित्तना संबंधे उत्पन्न थाय छे माटे तेओ निश्चयथी पुद्गलना ज छे एम निश्चित थाय छे. अरेरे! आवी वात सांभळवाय फुरसद ले नहि तो अनुभव तो कयारे करे?
आ प्रकारे एम सिद्ध कर्युं के पुद्गलकर्मना उदयना निमित्तथी थता चैतन्यना विकारो पण जीव नथी, पुद्गल छे. जुओ, विकार निमित्तथी थाय छे एम लख्युं छे के नहि? भाई! तुं अपेक्षा समज्यो नथी. निमित्त जे पुद्गलकर्म छे तेना लक्षे-आश्रये विकार थाय छे एम कह्युं छे. विकार थाय छे तो पोतानी पर्यायमां पोताने कारणे, परंतु स्वभावनुं ए कार्य नथी अने निमित्तना आश्रये ते थाय छे माटे निमित्तनुं कार्य छे एम कह्युं छे. भाई! कर्म, शरीर, मन, वाणी इत्यादि जड पदार्थो तो जड छे ज. अहीं तो विकारभाव जे छे ते स्वभावना आश्रये तो थतो नथी तेथी ए स्वभावनुं कार्य नथी; परंतु ए विकारभाव पुद्गलकर्मना आश्रये-लक्षे ज थाय छे, माटे ए विकार