Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२२० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ जड-पुद्गलनुं ज कार्य छे एम अपेक्षाथी कह्युं छे. आ प्रमाणे पुद्गलना निमित्तथी थतो विकार पण जड-पुद्गल ज छे, जीव नथी एम नक्की थाय छे. भाई! शास्त्र जे कहे छे ते प्रमाणे पोतानी द्रष्टि करवी जोईए, पण पोतानी द्रष्टिथी शास्त्रनो विचार करवो जोईए नहि; अन्यथा सत्य हाथ नहीं आवे.

पर कारकोथी निरपेक्ष विकार पोतानी पर्यायमां पोताना षट्कारकोथी उत्पन्न थाय छे. जुओ, पंचास्तिकायनी ६२मी गाथा. आत्माना द्रव्य-गुणमां तो विकार नथी, छतां पर्यायमां जे विकार थाय छे पोताना षट्कारकथी उत्पन्न थाय छे. द्रव्य-गुण विकारनुं कारण नथी केमके द्रव्य-गुणमां विकार नथी. पर निमित्त पण विकारनुं कारण नथी केमके परने ए विकारनी पर्याय अडतीय नथी, अर्थात् विकारनी पर्यायनो परमां अभाव छे, अने पर निमित्तनो विकारमां अभाव छे. अहा! ए पंचास्तिकायमां जीवास्तिकाय सिद्ध करवो छे. तेथी जीवनी पर्यायमां विकार पोताथी छे एम कह्युं छे. पण अहीं ए विकार चैतन्यस्वभावनुं कार्य नथी तथा पुद्गल-कर्मना निमित्तना संबंधे जेम ज्यां जे अपेक्षा छे ते यथार्थ समजवी जोईए.

शुभ आचरणथी जीवने धर्म थाय ए वात अज्ञानीने एवी अतिशयपणे द्रढ थई छे के त्यांथी खसवुं एने कठण पडे छे. एने मन प्रश्न थाय छे के शुभभावने तमे धर्म नथी कहेता तो शुं खावुं-पीवुं अने मोज-मझा करवी ए धर्म छे? अरे, प्रभु! तुं शुं कहे छे? ए वात ज अहीं कयां छे? खावा-पीवामां जे शरीरादिनी क्रिया छे ए तो जडनी छे. एने तो तुं करी शक्तो नथी, तथा खावा-पीवानो जे राग छे ए तो अशुभ ज छे. एनाथी तो धर्म केम होय? परंतु जे व्रत-तप-उपवासादिनो भाव छे ते पण शुभराग ज छे. ए शुभाशुभ बन्ने प्रकारना राग स्वयं थयेला चैतन्यना विकार छे, चैतन्यस्वरूप नथी. स्वभावनी द्रष्टिथी जोतां तेओ चैतन्यथी भिन्न जणाय छे.

अहाहा! त्रिकाळी ध्रुव भगवान ज्ञायकस्वरूप आत्मामां द्रष्टि देतां ए बन्ने शुभाशुभ राग अनुभूतिथी भिन्न रही जाय छे. माटे तेओ अचेतन छे. तथा ए शुभाशुभ राग, चैतन्यपूर्वक नहि पण कर्मना उदयपूर्वक थाय छे तेथी ते निश्चयथी कर्म-पुद्गलना ज छे एम सिद्ध थाय छे, कारणके कारण जेवुं कार्य होय छे. भाई! स्वभाव-विभावनुं आ प्रमाणे भेदज्ञान करी त्रिकाळी स्वभावनी द्रष्टि करी विभावने काढी नाखवानी आ ज रीत छे; अने आ प्रमाणे अनुसरण करतां धर्म थाय छे. आवी वात छे.

हवे पूछे छे के-वर्णादिक अने रागादिक जीव नथी तो जीव कोण छे? रंग, गंध, स्पर्श, रस, शरीर, संस्थान, संहनन, वर्ग, वर्गणा अने कर्म-बधा रंगमां जाय छे, अध्यवसान, राग, द्वेष, संकलेश-विशुद्धिनां स्थानो ए बधां रागमां जाय छे अने संयमलब्धिस्थान, मार्गणास्थान, जीवस्थान, गुणस्थान-ए बधां भेदमां जाय छे. रंग-राग