समयसार गाथा-६८ ] [ २२१ अने भेदमां ए बधां र९ बोल समाई जाय छे. हवे पूछे छे के आ रंग-राग अने भेदना भावो जीव नथी तो जीव कोण छे? रंग-राग अने भेदना भाव जीव नथी एम जेने लक्षमां आव्युं छे ते पूछे छे के-तो जीव कोण छे? तेना उत्तररूप श्लोक-कळश कहे छेः-
आ भगवान आत्मा कोण छे? रंग-राग अने भेदना भावो तो अजीव-पुद्गल छे. तो आ जीव केवो छे? तो कहे छे के ए चैतन्यस्वभावी वस्तु ‘अनादि’ अनादि छे, अर्थात् कोई काळे उत्पन्न थई नथी; तथा ते ‘अनन्तम्’ अनंत छे, अर्थात् एनो कोई काळे विनाश नथी; तेम ज ते ‘अचलम्’ अचळ छे अर्थात् ते कदीय चैतन्यपणाथी अन्यरूप-चळाचळ थतो नथी. शुं कह्युं? के आ चैतन्यस्वभावी जीवने आदि नथी, अंत नथी अने ते अचळ एटले चळाचळता विनानो कंप रहित ध्रुवपणे पडयो छे. अहाहा! चैतन्यस्वभावी भगवान आत्मा अचळ कहेतां चैतन्यपणाथी छूटी कदीय अन्यरूप थतो नथी. भगवान आत्मानो चैतन्यस्वभाव कदीय रागरूप थतो नथी. अहाहा! ए चैतन्यस्वरूप रंगरूपे तो न थाय, रागरूपे तो न थाय अने भेदरूपे पण कदीय न थाय एवी वस्तु छे. आवी वात छे, भाई!
वळी ते ‘स्वसंवेद्यम्’ स्वसंवेद्य छे. एटले के ते पोते पोताथी ज जणाय एवो छे. एटले शुं? के रंग-राग-भेदथी ते जणाय नहि, पण चैतन्यस्वभावनी निर्मळ परिणतिथी ज जणाय छे. अहाहा! चैतन्यप्रकाशनी मूर्ति भगवान आत्मा चैतन्यस्वभावथी ज पर्यायमां जणाय एवो छे. एटले के त्रिकाळी चैतन्यस्वभावी आत्मा वर्तमान चैतन्यपरिणतिथी ज जणाय छे.
चैतन्यस्वभावी भगवान आत्मा अनादि छे, अनंतकाळ रहेशे अने कदीय अन्यपणे न थाय एवो चळाचळता रहित अचळ छे. पण ते जणाय शी रीते? तो कहे छे के ते स्वसंवेद्य छे. एटले के ए ज्ञान अने आनंदनी निर्मळ पर्याय द्वारा ज जाणी शकाय छे. जो कोई एम कहे के ए व्यवहाररत्नत्रयथी जणाय छे तो ते बराबर नथी. व्यवहाररत्नत्रय तो राग छे, अने राग छे ए तो पुद्गल ज छे. पुद्गल एवा व्यवहाररत्नत्रयथी चैतन्यमय जीव केम जणाय? ए तो चैतन्यनां निर्मळ प्रतीति-ज्ञान-रमणता वडे ज जणाय एम छे. आ सिवाय बीजा लाख-क्रोड क्रियाकांड करे तो एनाथी ए जणाय एम नथी एम कहे छे.
व्यवहाररत्नत्रयनो राग, देव-शास्त्र-गुरुनी श्रद्धानो राग अने पंचमहाव्रतना परिणाम इत्यादि बधुंय तो रागमां-पुद्गलमां जाय छे. ‘मैं ज्ञानानंद स्वभावी हूँ’-आवे छे ने हुकमचंदजीनुं? एमां रंग-राग अने भेदथी भिन्न-एम त्रण बोल लीधा छे. एटले के