२२२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ भगवान आत्मा रंग, राग अने भेदथी भिन्न ज्ञानानंदस्वभावी चैतन्यथी स्वयं परिपूर्ण वस्तु छे. ए रंग, राग अने भेदना भावोथी केम जणाय? न जणाय.
प्रश्नः– दीपचंदजीए आत्मावलोकनमां शुभभाव परंपरा साधक छे एम कह्युं छे ने?
उत्तरः– भाई! शुद्ध चैतन्य जणाय छे तो पोतानी निर्मळ परिणतिथी ज केमके ए स्वसंवेद्य छे, परंतु जे शुभभावने टाळीने निर्मळ परिणति थाय छे ए शुभभावने आरोपथी परंपरा साधक कह्यो छे.
अहाहा! एक श्लोकमां केटलुं भर्युं छे! कहे छे के चैतन्यस्वभावमय आत्मा अनादिनो छे, अनंतकाळ रहेनारो छे, चळाचळ विनानो अकंप ध्रुव भगवान छे. ते वर्तमानमां जणाय केवी रीते? तो पोते पोताथी ज जणाय छे एम कहे छे. निर्मळ सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी परिणतिथी ज जणाय छे. जाणवामां त्रणेय साथे ज होय छे. कलशटीकामां प्रश्न उठाव्यो छे के- तमे ज्यारे एम कहो छो के आत्मा तो दर्शन-ज्ञानथी जणाय छे, तथा मोक्षमार्ग तो दर्शन- ज्ञान-चारित्रमय छे, तो त्यां मोक्षमार्ग केवी रीते बने छे? मिथ्यात्व जतां सम्यग्दर्शन-ज्ञान थयुं छे, चारित्र तो थयुं नथी, तो तेने मोक्षमार्ग केवी रीते कहेवाय? तेनो खुलासो कर्यो छे के- भाई! दर्शन-ज्ञान थतां एमां चारित्र आवी जाय छे. चैतन्यस्वभावी आत्मानुं श्रद्धान-ज्ञान थतां एना सन्मुखनी प्रतीति, एना सन्मुखनुं ज्ञान अने एना सन्मुखमां स्थिरता ए त्रणेय भेगां छे. अहाहा! भगवान आत्मा स्वसंवेद्य छे एमां ए त्रणेय भेगां छे. एटले के निर्विकल्प सम्यक् प्रतीतिथी, राग विनाना ज्ञानथी अने अस्थिरतारहित स्थिरताना अंशथी-एम एक साथे त्रणेयथी भगवान आत्मा जणाय छे. आवी वात छे.
कह्यो छे. ज्यारे अहीं स्फुट प्रगट एटले व्यक्त कह्यो छे. चैतन्यज्योत चकचकाट मारती प्रगट छे एम अहीं कहे छे. पर्यायनी अपेक्षाए ते गुप्त-अव्यक्त छे, पण स्वभावनी अपेक्षाए तो ए व्यक्त-प्रगट ज छे. पर्यायने ज्यारे व्यक्त कहेवाय छे त्यारे वस्तु-द्रव्यने अव्यक्त कहेवाय छे, केमके पर्यायमां त्रिकाळी द्रव्य आवतुं नथी. पण ज्यारे द्रव्यने ज कहेवुं होय त्यारे चैतन्यस्वभावमय वस्तु-द्रव्य चकचकाटमय वर्तमानमां पोतानी सत्ताथी मोजुद प्रगट ज छे एम आवशे. पण ते कोने प्रगट छे? अहाहा! भगवान आत्मा चैतन्यस्वभावस्वरूप शाश्वत जाज्वल्यमान ज्योत् प्रगट छे, पण कोने? के जेणे एने जाण्यो-अनुभव्यो छे एने. भाई! आ तो त्रणलोकना नाथ वीतराग परमेश्वरनी वाणी छे! संतो एने जगत सामे जाहेर करे छे.
कहे छे के आत्मा तो वस्तु तरीके प्रगट, प्रसिद्ध, मोजुद छे, परंतु पर्यायबुद्धिमां ते अप्रसिद्ध, ढंकायेलो छे. अने तेथी अज्ञानीने ते छे ज नहि. वर्तमान अंश अने