Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-६८ ] [ २२३ रागना प्रेममां अज्ञानीए चैतन्यस्वभावी आत्माने मरणतुल्य करी नाख्यो छे. परंतु पोतानी निर्मळ परिणति द्वारा ज्यारे ते जाणवामां आवे त्यारे ते जीवती ज्योत प्रगट ज छे-एम कहे छे, आवी वात छे जैनदर्शननी! अहो! जैनदर्शन अलौकिक छे! जैनधर्म एटले शुं? जैनधर्म अनुभूतिस्वरूप एटले के वीतरागतास्वरूप छे. अहाहा! जैन एने कहेवाय के जेणे रागने जीत्यो छे अने पर्यायमां वीतरागता प्रगट करी छे. आवो जैनधर्म! पण आव्यो वाणियाने हाथ, वाणिया वेपारमां कुशळ एटले बस धंधामां ज गरी गया. बिचाराओने समजवानी फुरसद नहि, एटले आ कर्युं अने ते कर्युं-एम बहारनी क्रियाओ करी; पण भाई! ए बधी अज्ञाननी होळी छे.

रंग-राग अने भेदना भावो तो पुद्गल छे. तो ए सर्वथी भिन्न भगवान आत्मा केवो छे? तो कहे छे ‘इदं चैतन्यम्’ आ एटले आ प्रगट चैतन्यस्वभावमय ज आत्मा छे. अहाहा! भगवान आत्मा एकला चैतन्यस्वभावथी भरेलो छे. अर्थात् चैतन्यस्वभाव ए ज आत्मा छे. आ (६८ मी) गाथानी टीकामां आवे छे के चैतन्यस्वभावथी व्याप्त आत्मा छे. आत्मामां चैतन्यस्वभाव व्याप्त छे एम न कहेतां चैतन्यस्वभावथी व्याप्त आत्मा छे एम कही शुं सिद्ध करवुं छे? ए के चैतन्यस्वभाव त्रिकाळ कायम रहेलो छे अने ए व्यापक छे अने आत्मा एनुं व्याप्य छे. मोक्ष अधिकारनी गाथा र९८-र९९ नी टीकामां पण आवे छे के चेतनाथी व्याप्त आत्मा छे, अर्थात् चेतना व्यापक अने चेतन आत्मा एनुं व्याप्य छे, आथी चैतन्यस्वभाव कायमी छे एम सिद्ध कर्युं छे.

आत्मा रंग-राग-भेदथी व्याप्त नथी, भिन्न छे, तो ते शुं छे? तो कहे छे के चैतन्यस्वभावथी व्याप्त आत्मा छे. आवो चैतन्यस्वभाव सदाय प्रगट छे, स्फुट छे, प्रत्यक्ष छे. अहाहा! शुद्ध चैतन्यनी परिणतिथी जणाय एवो ते वर्तमानमां प्रत्यक्ष छे. मति-श्रुतज्ञाननी पर्यायमां ए जणाय एवो वर्तमानमां प्रत्यक्ष, प्रगटपणे बिराजमान छे. रागनी अपेक्षाए ते चैतन्यस्वरूप आत्मा गुप्त छे, ढंकायेलो छे, केमके रागमां ते आवतो नथी, जणातो नथी. परंतु निर्मळ परिणति द्वारा ते स्फुट-प्रगट ज छे, छूपायेलो नथी. शुं कह्युं? के दया, दान, व्रत, तप, भक्ति इत्यादिना विकल्पकाळे वस्तु प्रसिद्ध नथी, गुप्त छे केमके ए विकल्पोमां वस्तु आवती नथी. वस्तु तो निर्विकल्प चैतन्यमय शुद्ध छे, अने ते शुद्ध परिणतिनी अपेक्षाए प्रगट-प्रत्यक्ष ज छे. चैतन्यतत्त्व निर्मळ परिणतिथी प्रसिद्ध-प्रगट ज छे. अहा! शैली तो जुओ! केवी स्पष्ट वात छे!

जुओ, आ आत्मा चैतन्यनी निर्मळ परिणति द्वारा जणाय छे अने ते जणाय छे त्यारे ते प्रत्यक्ष छे, प्रगट छे एम जणाय छे. ते परोक्ष छे, अप्रगट छे-ए तो जे रागनी रमतमां (प्रेममां) बेठो छे एने माटे छे. जे व्यवहाररत्नत्रयनी रमतमां (प्रेममां) पडयो छे तेने तो भगवान आत्मा अप्रत्यक्ष-गुप्त छे, केमके तेने ए जणातो ज नथी.