२२४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ छतां आत्मवस्तु ते काळे रागरूप थई जती नथी. रागना काळे आत्मवस्तु गुप्त छे, पण रागरूप थई जती नथी. तथा ज्यारे स्वसंवेदनज्ञाननी निर्मळ परिणति द्वारा ते जणाय छे त्यारे ते प्रत्यक्ष ज छे एम जणाय छे. आवुं स्वरूप छे, भाई! तो आवो आत्मा शुं जिनदेवनो हशे! भाई, जिनदेवनो एटले जिनस्वरूपी एवा आ भगवान आत्मानो. अहाहा! बधाय आत्मा निश्चये आवा छे. समयसार नाटकमां अंतिम प्रशस्तिमां ३१मा छंदमां बनारसीदासे कह्युं छे ने के-
चैतन्यस्वरूप भगवान आत्मानुं आवुं स्वरूप छे के जे प्रगट छे, ढंकायेलुं नथी. अज्ञानदशामां ते गुप्त हतुं पण हवे ते ज्ञानदशामां प्रगट थई गयुं छे एम कहे छे. दया, दान, व्रत, भक्ति आदिना रागनी परिणतिमां तो ते चैतन्यवस्तु गुप्त हती, पण हवे स्व- परिणतिना वेदनथी ते प्रत्यक्ष-प्रगट थई छे. बहु टूंका शब्दोमां आत्माने प्रसिद्ध कर्यो छे. टीकानुं नाम पण आत्मख्याति छे ने! भगवान आत्मा चैतन्यस्वभावमय वस्तु छे. ते स्वसंवेद्य छे. कजात एवा रागादि वडे ते जणाय एम नथी, केमके रागादि भाव चैतन्यना- आत्माना नथी, पण पुद्गलना छे. देव-गुरु-शास्त्रनी श्रद्धानो राग हो तो पण तेमां चैतन्यनो अंश नथी तेथी कजात छे, पुद्गलमय छे. तेथी रागादि वडे आत्मा जणाय एवो नथी. छतां चैतन्यस्वभाव तो त्रिकाळ जेवो छे तेवो ज छे. रागकाळे पण तेवो ज छे. परंतु तेने जाणवाना काळे-स्वसंवेदनना काळे ते जेवो छे तेवो प्रत्यक्ष अने प्रगट थाय छे एम कहे छे.
अहाहा! आ तो कळश चढाव्यो छे कळश! जेम मंदिर बनावीने एना उपर काट विनानो सोनानो कळश चढावे छे, तेम राग विनानो चैतन्य-चमत्कारस्वरूप भगवान आत्मा निर्मळ परिणति द्वारा-शुद्ध रत्नत्रय द्वारा जणाय छे त्यारे ते प्रत्यक्ष-प्रगट छे एम जणाय छे- आम टीका उपर कळश चढाव्यो छे. अरे, भाई! जरा पुरुषार्थ करीने मति-श्रुतज्ञानना उपयोगने सूक्ष्म कर तो चैतन्यतत्त्व मळे एवुं छे. ज्ञाननो उपयोग निज चैतन्यमां जोडवो ते सूक्ष्म उपयोग छे. ए सूक्ष्म उपयोग वडे वस्तु प्रगट छे एम भान थाय छे. स्थूळ रागना उपयोगथी चैतन्यवस्तु नहि मळे, भाई! केमके ए स्थूळ उपयोगनी पर्याय पुद्गलनी छे. अहा! आवी वात लोकोने एकांत लागे, पण भाई! मार्ग आ ज छे, बापु! आ सम्यक् एकांत ज छे.
श्रीमद् राजचंद्रे पण कह्युं छे के-‘अनेकान्त पण सम्यक् एकान्त एवा निजपदनी प्राप्ति सिवाय अन्य हेतुए उपकारी नथी.’ सम्यक् एकान्तनुं (शुद्ध चैतन्यमय आत्मानुं) भान ज्यारे थाय छे त्यारे पर्याय अने रागनुं ज्ञान थाय छे-होय छे, अने तेने अनेकान्तनुं